आर्टेमिस अस्पताल में इम्यूनोथेरेपी के साथ, तीन महीने के उपचार के बाद रोगी का ट्यूमर पूरी तरह से गायब


गुरुग्राम/ फरीदाबाद ( abtaknews.com)12 जनवरी, 2022:आर्टेमिस अस्पताल, गुरुग्राम के डॉक्टरों ने चौथे चरण के फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित अरुणाचल प्रदेश के एक 49 वर्षीय व्यक्ति का इम्यूनोथेरेपी के साथ सफलतापूर्वक इलाज किया। यह इलाज की बेहतरीन पद्धति है जिसमें उपचार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के जरिये होता है, जिसमें वह कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और मारने में सक्षम बनाता है।  रोगी ने अपने अधिकांश जीवन अधिक धूम्रपान किया था और अस्पताल में चरण-चार forth stageफेफड़ों के कैंसर के साथ भर्ती कराया गया था, लेकिन वह चमत्कारी रूप से ठीक हो गया और उसका  ट्यूमर केवल तीन महीनों में लगभग पूरी तरह से गायब हो गया। 


श्री दोरजी (अनुरोध पर नाम बदला गया), अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर के एक व्यवसायी ने लगातार सांस फूलने और वजन घटने के समस्या के साथ आर्टेमिस अस्पताल से संपर्क किया। उनके पीईटी स्कैन और बायोप्सी से पता चला कि वह अंतिम चरण के फेफड़ों के कैंसर (चरण 4) से पीड़ित थे। सांस लेने में गंभीर समस्या होने के कारण उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया था।


आर्टेमिस के डॉक्टरों के लिए इसे संभालना कोई आसान मामला नहीं था। हालांकि कीमोथेरेपी फेफड़ों के कैंसर के इलाज का पारंपरिक तरीका है, लेकिन जब मरीज घातक बीमारी के चौथे चरण में होता है तो परिणाम बहुत उत्साहजनक नहीं होते हैं।चौथा चरण फेफड़े के कैंसर वाले अधिकांश रोगियों के लिए जीवित रहने की अवधि सिर्फ 8-12 महीने है। इसलिए, आर्टेमिस के डॉक्टरों ने रोगी के जीवन को बचाने के लिए कुछ नया करने का फैसला किया और इम्यूनोथेरेपी का चयन किया जिसमें कम क्षमता की कीमोथेरेपी का सहयोग लिया गया।


डॉ. विनीत गोविंदा गुप्ता, आर्टेमिस अस्पताल, गुरुग्राम ने कहा: “हर चरण में से चौथा चरण कैंसर रोगी एक चुनौती है। कई दशकों से ऑन्कोलॉजी की आधारशिलाओं में से एक यह विश्वास रहा है कि चरण 4 फेफड़े का कैंसर लाइलाज है और बहुत ही कम रोगी जीवित बचपाते है। हालांकि, नई कैंसररोधी  तकनीक उपचार में एक आदर्श बदलाव का प्रतिनिधित्व करती है। दीर्घकालिक डेटा से पता चलता है कि कीमोथेरेपी के विपरीत, जो चरण 4 फेफड़ों के कैंसर का इलाज नहीं कर सकती है, ऐसे लगभग 20-25% रोगियों को इम्यूनोथेरेपी से पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है जो न्यूनतम दुष्प्रभावों के साथ लंबे समय तक जीवित रहने  में सक्षम बनाता है।


इम्यूनोथेरेपी की प्रक्रिया में दो भाग होते हैं; सबसे पहले, सावधानीपूर्वक चयनित इम्यूनोथेरेपी प्रोटोकॉल के तहत इंट्रावेनस इंजेक्शन रोगी को दिया जाता है। दूसरा, अधिकतम प्रतिक्रिया और विषाक्तता के लिए रोगी की निगरानी की जाती है और यह सुनिश्चित करने के लिए उचित समायोजन किया जाता है कि रोगी के पास न्यूनतम या बिना किसी दुष्प्रभाव के सही होने का सबसे अच्छा मौका है। प्रारंभिक हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है।


दोरजी के मामले में परिणाम सकारात्मक था। डॉ. विनीत गोविंदा गुप्ता ने कहा: “एक महीने के भीतर, रोगी की स्थिति में बहुत तेजी से से सुधार हुआ। उनकी भूख और ऊर्जा के स्तर में सुधार हुआ और सांस फूलने और दर्द की समस्या दूर हो गई। रोगी को किसी बड़े दुष्प्रभाव का सामना नहीं करना पड़ा। तीन महीने के बाद, एक बार फिर पीईटी स्कैन किया गया, और हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब ट्यूमर लगभग पूरी तरह से गायब हो गया था।" 


उसके बाद रोगी की कीमोथेरेपी को कम कर दिया गया, जबकि उसकी इम्यूनोथेरेपी को जारी रखा गया। रोगी के नवीनतम पीईटी स्कैन के अनुसार, फेफड़े का कैंसर पूरी तरह से दूर हो गया है। डॉक्टर ने कहा कि “हम लगभग दो साल बाद मरीज की इम्यूनोथेरेपी बंद कर देंगे। वह अब एक बेहतर और पूरी तरह से सामान्य जीवन जी रहा है और खतरनाक बीमारी का कोई सबूत नहीं है। इम्यूनोथेरेपी की कम विषाक्तता लो टॉक्सिसिटी, कीमोथेरेपी की तुलना में बहुत कम, एक अतिरिक्त बोनस है ।”

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