लॉकडाउन में अभिभावकों की फीस में रियायत देने का अधिकार राज्य सरकारों को,केंद्रीय शिक्षामंत्री के बयान पर आपत्ति

फरीदाबाद(Abtaknews.com)21जुलाई,2021: केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि लॉकडाउन में अभिभावकों की आर्थिक स्थिति में आई गिरावट को देखते हुए उनके बच्चों की फीस में कमी करने का अधिकार राज्य सरकारों को है। उन्होंने यह बात इस विषय पर लोकसभा में सांसद सुधीर गुप्ता,चंद्रशेखर साहू, विद्युत बरान महतो, श्रीरिरांग अप्पा बरने, संजय सदाशिवराव मांडलिक के अतारांकित प्रश्न के उत्तर में कही। लोकसभा में इन सांसदों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से पूछा था कि लोकडाउन में अभिभावकों की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई है ऐसे हालात में उनके बच्चों की फीस में कमी करने के बारे में केंद्र सरकार की क्या योजना रही है। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लिखित जवाब में कहा है कि अधिकांश स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में हैं। "शुल्क में कमी का विषय राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों के दायरे में है।" "शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है और अधिकांश स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय संबंधित राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारों के अधीन हैं।" ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और दिल्ली यूनिवर्सिटी कोर्ट के सदस्य अशोक अग्रवाल ने कहा कि केंद्रीय शिक्षामंत्री का यह जवाब कि, शुल्क में कमी का विषय राज्य सरकारों के दायरे में है, गलत है। यह सरकार फीस के मुद्दे पर अभिभावकों को कोई राहत देना ही नहीं चाहती है और ना कोई कानून लाना चाहती है क्योंकि वह स्कूलों द्वारा निजीकरण और मुनाफाखोरी को बढ़ावा देना चाहती है। शिक्षा समवर्ती विषय होने के कारण केंद्र व राज्य दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है। केंद्र को यह पूरा अधिकार है कि वह लॉकडाउन के समय में भी और बाद में भी कॉलेज व स्कूलों द्वारा अभिभावकों से वसूली जाने वाली फीस को लेकर एक केंद्रीय कानून बनाए। ऑल इंडिया पैरेंट्स एसोसिएशन आईपा ने फीस को लेकर एक केंद्रीय कानून बनाने के लिए एक फीस ड्राफ्ट प्रधानमंत्री को भेज रखा है। लेकिन उस पर कोई भी उचित कार्रवाई नहीं हो पाई है। श्री अग्रवाल ने कहा कि केंद्र सरकार को फीस को लेकर संसद में एक कानून लाने का अधिकार है। आईपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश शर्मा ने कहा है लगभग 10 राज्यों ने एजुकेशन एक्ट व नियमावली बना रखी है लेकिन इनमें से कोई भी फीस व फंड्स को लेकर अभिभावकों की कोई भी मदद नहीं करता है। सभी स्कूल संचालकों के हित में बने हुये हैं। इसको देखते हुए भी एक केंद्रीय कानून जरूरी है। जिससे प्राइवेट कॉलेज व स्कूलों की मनमानी फीस पर अंकुश लगाया जा सके। उदाहरण के लिए हरियाणा में 1995 में एजुकेशन एक्ट बना। 8 साल बाद 2003 में उसके नियम बनाए गए जिसे शिक्षा नियमावली 2003 कहा गया। नियमावली तो बना दी गई लेकिन इसमें प्राइवेट स्कूलों द्वारा हर साल बढ़ाई जा रही ट्यूशन फीस, गैरकानूनी फंडों में वसूली जा रही फीस व हर प्रकार से किए जा रहे शिक्षा के व्यवसायीकरण पर रोक लगाने के लिए कोई भी नियम कानून नहीं बनाए गए हैं इसी का फायदा स्कूल प्रबंधक उठा रहे हैं इतना ही नहीं इस शिक्षा नियमावली में अब तक स्कूल प्रबंधकों के हित में 8 संशोधन कर दिए गए हैं इस नियमावली को पूरी तरह से लुंज पुंज बना दिया गया है। अशोक अग्रवाल ने कहा है कि लॉकडाउन के चलते अप्रैल 2020 से स्कूल बंद हैं, स्कूलों में कोई विकास कार्य व अन्य गतिविधि नहीं हो रही है उसके बावजूद स्कूल प्रबंधक विकास शुल्क, वार्षिक शुल्क, परीक्षा शुल्क, ट्रांसपोर्ट फीस और न जाने कितने फंडों में फीस मांग रहे हैं। ट्यूशन फीस में भी वृद्धि कर दी है।अभिभावक इसका विरोध कर रहे हैं। सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, सांसद विधायक सभी को इसकी जानकारी है लेकिन वह स्कूल संचालकों के दबाव में छात्र व अभिभावकों की कोई मदद नहीं कर रहे हैं। आइपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश शर्मा ने मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री हरियाणा से अपील की है कि वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री के लोकसभा में दिए गए बयान कि,, लॉकडाउन में शुल्क में कमी का विषय राज्यों के दायरे में है के मद्देनजर हरियाणा के अभिभावकों को फीस में राहत प्रदान कराएं। 

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