आध्यात्मिक प्रगति हेतु सूक्ष्म स्पंदनों का अभ्यास मूलभूत आवश्यकता

फरीदाबाद(Abtaknews.com) 10 जून, 2021:कोई भी धार्मिक अथवा आध्यात्मिक शोध हो, प्रशिक्षण होे उनमें सूक्ष्म स्तरीय स्पंदनों का अध्ययन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । (सूक्ष्म अनुभव अर्थात पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि के परे का ज्ञान अथवा स्पंदन अनुभव करना) किसी जीव को साधना कर आध्यात्मिक प्रगति करनी हो, तो उसे सूक्ष्म स्तरीय स्पंदनों का अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है । अध्यात्म के इस पहलू का अध्ययन जितना अधिक होगा, उतना ही साधना में अनुचति पथ पर जाकर मनुष्य जन्म व्यर्थ होने की संभावना अल्प होती है । साथ ही अध्यात्म का यह पहलू समझने पर व्यक्ति साधना प्रवास में आध्यात्मिक दृष्टि से योग्य निर्णय ले सकता है, ऐसा 'महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय' के श्री. शॉन क्लार्क ने कहा । 'सूक्ष्म स्पंदनों का अध्ययन धार्मिक शिक्षा और शोध की मूलभूत आवश्यकता' इस विषय पर शोधनिबंध प्रस्तुत करते हुए श्री. क्लार्क बोल रहे थे ।

कोर्दाबा, स्पेन में 'रिलिजन इन सोसाइटी रिसर्च नेटवर्क एन्ड कॉमन ग्राउंड रिसर्च नेटवर्क्स' संस्था द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय परिषद आयोजित की गई थी । धर्म और अध्यात्म विषय पर आयोजित इस 11 वीं परिषद में यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया गया । इस शोधनिबंध के लेखक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी हैं तथा श्री. शॉन क्लार्क सहलेखक हैं । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा वैज्ञानिक परिषद में प्रस्तुत किया गया यह 72 वां शोधनिबंध था । इससे पूर्व विश्‍वविद्यालय ने 15 राष्ट्रीय और 56 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषदों में शोध निबंध प्रस्तुत किए हैं । इनमें से 4 अंतरराष्ट्रीय परिषदों में विश्‍वविद्यालय ने 'सर्वश्रेष्ठ शोधनिबंध' पुरस्कार प्राप्त किए है ।

श्री. शॉन क्लार्क ने सूक्ष्म स्पंदनों का अधिक अध्ययन करने हेतु 'पिप' और 'यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर (यूएएस)' उपकरणों का उपयोग कर किए विविध प्रयोग और उनके परिणामों की भी जानकारी दी ।

प्रयोग 1 : 'पिप' और 'यूएएस्' उपकरणों का उपयोग कर यह प्रयोग अध्यात्म से संबंधित 3 ग्रंथों पर किया गया । इनमें से एक ग्रंथ विश्‍व के लोकप्रिय आध्यात्मिक मार्गदर्शक ने लिखा है । इस ग्रंथ की लाखों प्रतियां बिकी हैं तथा उसका समावेश 'न्यूयार्क बेस्ट सेलर' की सूची में भी किया गया है । दूसरा ग्रंथ स्वयं को आध्यात्मिक मार्गदर्शक न कहनेवाले किन्तु अध्यात्म संबंधी पुस्तक लिखनेवाले लेखक ने लिखा है तथा उसकी अत्यधिक बिक्री हुई है । इस पुस्तक का समावेश भी 'न्यूयार्क बेस्ट सेलर' की सूची में है । तीसरा ग्रंथ भारत के परात्पर गुरुजी ने लिखा है । परात्पर गुरु अर्थात जिनका आध्यात्मिक स्तर 90 प्रतिशत से अधिक है, ऐसे उच्च स्तर के गुरु । संतों द्वारा लिखित ग्रंथ से सर्वाधिक सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं, ऐसा जांच द्वारा सिद्ध हुआ । अन्य दो लेखकों के ग्रंथों से विविध स्तरों पर नकारात्मक स्पंदन निर्माण होते हैं, ऐसा भी ध्यान में आया ।

प्रयोग 2 : उपरोक्त ग्रंथ दो व्यक्तियों को 20 मिनिट पढने के लिए कहा गया । 'यूएएस' उपकरण द्वारा इन दोनों व्यक्तियों की वाचन के पूर्व और उपरांत के प्रभामंडल की जांच की गई । ऐसा ध्यान में आया कि प्रथम दोनों पुस्तकें पढकर 'इन व्यक्तियों के प्रभामंडल की नकारात्मकता में वृद्धि हुई है ।' तीसरा ग्रंथ पढने पर इन दोनों व्यक्तियों में निर्माण हुई नकारात्मकता नष्ट हुई और उनमें सकारात्मता निर्माण हुई ।

प्रयोग 3 : इस प्रयोग में तीन चित्रकारों द्वारा बनाए गए महालक्ष्मी देवी के चित्र से प्रक्षेपित स्पंदनों का अध्ययन करने के लिए 'पिप' उपकरण का उपयोग किया गया । इनमें से एक विख्यात चित्रकार थे, दूसरे व्यावसायिक चित्रकार थे । तीसरे 'महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय' के चित्रकार साधक थेे, जिन्होंने यह चित्र परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में बनाया था । इनमें से नामांकित चित्रकार द्वारा बनाए गए चित्र से सकारात्मक स्पंदनों की तुलना में नकारात्मक स्पंदन अधिक मात्रा में प्रक्षेपित हो रहे थे । व्यावसायिक चित्रकार द्वारा बनाए गए चित्र से सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित हो रहे थे और चित्रकार साधक द्वारा बनाए चित्र से अत्यधिक मात्रा में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित हो रहे थे ।

प्रयोग 4 : तीन चित्रकारों द्वारा बनाए गए महालक्ष्मी देवी के चित्र से प्रक्षेपित स्पंदनों का अध्ययन 'यूएएस' उपकरण की सहायता से भी किया गया । तब विख्यात चित्रकार द्वारा बनाए गए चित्र का नकारात्मक प्रभामंडल 1.35 मीटर था । साधक चित्रकार द्वारा बनाए चित्र में नकारात्मक स्पंदन नहीं थे, अपितु उसकी सकारात्मक प्रभामंडल 2.56 मीटर थी ।

प्रयोग 5 : पूर्ण विश्‍व के विविध धार्मिक स्थलों से लाए गए जल के 24 नमूनों का अध्ययन 'यूएएस' उपकरण की सहायता से किया गया । उनमें से 40 प्रतिशत जल के नमूनों से नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित हो रहे थे । उनमें से एक जल के नमूने का नकारात्मक प्रभामंडल सर्वाधिक अर्थात 4.6 मीटर था ।

प्रयोग 6 : इस प्रयोग में मूल स्वस्तिक, उल्टा स्वस्तिक, 45 डिग्री कोण में झुका स्वस्तिक और नाजी स्वस्तिक से प्रक्षेपित स्पंदनों का अध्ययन 'यूएएस' उपकरण की सहायता से किया गया । इनमें से केवल मूल स्वस्तिक चिन्ह का सकारात्मक प्रभामंडल था तथा अन्य सभी का नकारात्मक प्रभामंडल था । नाजी स्वस्तिक की नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल अब तक किए गए आध्यात्मिक शोधों में सबसे अधिक है , ऐसा श्री. क्लार्क ने बताया ।

प्रयोग 7 : इस प्रयोग में 4 प्रकार की संगीत शैलियों का व्यक्ति पर होनेवाला परिणाम 'यूएएस' उपकरण द्वारा जांचा गया । उनमें से 'हेवी मेटल' संगीत सुनने से नकारात्मकता बढी, शांत संगीत का कुछ भी परिणाम अनुभव नहीं हुआ, एक प्रसिद्ध गायक की आवाज में भारतीय शास्त्रीय संगीत सुनने पर कुछ मात्रा में सकारात्मता में वृद्धि हुई और एक संत द्वारा गाया भक्तिसंगीत सुनने पर अत्यधिक मात्रा में सकारात्मकता में वृद्धि हुई ।

इन प्रयोगों का निष्कर्ष बताते हुए श्री. क्लार्क ने कहा कि, 'साधना के मूलभूत सिद्धांतानुसार नियमित साधना करने से आध्यात्मिक दृष्टि से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है और नकारात्मक ऊर्जा न्यून होती है । साथ ही नियमित साधना के कारण कुछ काल उपरांत आध्यात्मिक दृष्टि से सकारात्मक और नकारात्मक स्पंदनों में अंतर भी समझ आता है ।'

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