जल क्रांति हेतु जन सहभागिता हैं जरुरी : बिशन सिंह


नई दिल्ली(Abtaknews.com)10जून,2021: नैनीताल राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन जल शक्ति मंत्रालय भारत सरकार, विज्ञान प्रसार एवं नौला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वाधान में 10, 11 और 12 जून को हितधारक वेबिनार का आयोजन किया जा रहा हैं जिसका उद्देश्य युवाओं को जल जंगल जमीन के संरक्षण पर जागरूक करना है। हिमालयी वर्षा वनों में निकलने वाले परम्परागत जल स्रोतों स्प्रिंग से बनी नदियाँ (गाड या गधेरा) एक जटिल वेब बनाती है जो गंगा बेसिन में बारहमासी जल आपूर्ति की रीढ़ है । समृद्ध पारिस्थितिकी व मिश्रित जैव विविधता से परिपूर्ण मिश्रित जंगल न केवल पानी को संरक्षित करते है बल्कि जल स्पंज को भी बनाये रखते है । यही बहते वर्षा जल को आज संरक्षित करने की जरुरत हैं। बगैर परस्पर जन सहभागिता के ये मुमकिन नहीं हैं। समय आ गया हैं अब राष्ट्रीय जल नीति में स्प्रिंग की भूमिका भी तय की जाय और समुदाय आधारित कार्यप्रणाली पर जोर देना होगा, ये कहना हैं उत्तराखंड में बिगत तीन वर्षो से पहाड़ पानी परम्परा के सरंक्षण संवर्धन पर गंभीरता से लगी समुदाय आधारित संस्था नौला फाउंडेशन के संस्थापक बिशन सिंह का। उत्तराखंड के जनमानस की भावनाओं की सामुदायिक पहल नौला फाउंडेशन जिसका एकमात्र उद्देश्य परस्पर सामाजिक सहभागिता से हिमालयन डिक्लेरेशन ऑफ़ स्प्रिंगशेड रेजुवेनशन (HDSR) गाइडलाइन्स के तहत पहाड़ पानी परम्परा पर समस्त हिमालयी जलीय एवं जैव पारिस्थितिकी के सरंक्षण के साथ उत्तराखंड राज्य की समस्त जलवायु परिवर्तन से उपजे संकट से पर्यावरण सम्बन्धी चिंताओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर समस्त हितधारको के साथ समाधान खोजना और उनको सामाजिक सहभागिता से अंतिम कार्यरूप देना है । फाउंडेशन ने पूरे उत्तराखंड में मध्य हिमालयी क्षेत्र विशेष (विशेषकर प्रथम चरण में स्प्रिंग आधारित खीर गंगा एवं गगास नदी घाटी क्षेत्र) में प्राकृतिक एवं भूजल, हिमालयी क्षेत्र की नदियों एवं गधेरो का सरंक्षण, हिमालयी जैव विविधता का सरंक्षण, जंगल, ज़मीन का वैज्ञानिक विधि से सरंक्षण, संवर्धन एवं शोध (रिसर्च) पर कार्य शुरू कर दिया हैं , और समस्त हिमालयी परिक्षेत्र के किसानों को पहाड़_पानी_परम्परा के ज़रिये आर्थिक रुप से आत्म निर्भर बनाने का सफल प्रयास कर रही है । आज उत्तराखंड का लगभग जागरूक युवा पहाड़ मैं ही रहकर विभिन्न स्वयं सहायता समूहों के ज़रिये फाउंडेशन से जुड़कर सफलता के नित नये आयाम जोड़ने की कोशिश कर रहा हैं । उत्तराखंड में विशेषतः पर्वतीय जनपदों में पेयजल के स्रोत नौले, धारों (झरने) और गधेरों आदि के रूप में हैं। अधिकतर जगहों पर भूमिगत जल का दोहन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण संभव नहीं है। प्रदेश में प्राकृतिक पेयजल स्रोतों के स्राव में निरंतर कमी आ रही है । अनेक स्रोतों के क्षतिग्रस्त होने पर सूख जाने के कारण पानी का संकट गहराता जा रहा है । अतः यह नितांत आवश्यक है कि उन्हें बचाया जाए और वैज्ञानिक ढंग से उपचारित कर पुनर्जीवित किया जाए। नौलों, चालों, खालों व लुप्तप्राय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के पश्चात उनकी उचित देखभाल, संरक्षण, प्रबंधन से पुनः निष्क्रिय होने से बचाने की प्रतिबद्धता की जरुरत हैं । वर्षा जल का भण्डारण व संचयन न होने के कारण स्थानीय जल स्रोतों के रिचार्ज की व्यवस्था समाप्त हो गई है । सड़कों और भवनों में सीमेंट, कंक्रीट आदि का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे कच्ची जमीन (जो वर्षा जल को सोखकर स्रोतों को रिचार्ज कर सकती है ) की उपलब्धता निरंतर कम होती जा रही है ।अतः वर्षा जल का संचयन और भण्डारण आवश्यक है। जल स्रोतों के स्राव में निरंतरता बनाए रखने और भूमि का क्षरण और कटाव रोकने के लिए वृक्षारोपण आवश्यक है और नौला फाउंडेशन ने इस दिशा में गंभीर प्रयास किये हैं। आम जनता में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने की क्षमता का विकास करना, रखरखाव व संचालन करना, निरंतर विचार गोष्ठियों और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना नौला फाउंडेशन का उद्देश्य है । वृक्षारोपण व वनीकरण से स्थानीय जनता की चारा, लकड़ी, ईंधन की आवश्यकता की पूर्ति के साथ साथ भूमि कटाव को रोकने और भूमि की नमी को बनाए रखने में मदद मिलेगी जिससे असिंचित भूमि की वर्षा पर निर्भरता कम हो जाएगी । मृदा का परीक्षण करवा कर क्षेत्र के लिए उपयुक्त प्रजाति के वृक्षों के रोपण की व्यवस्था फाउंडेशन करवाने के लिए प्रयासरत है । प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए जलागम क्षेत्र में गहन वृक्षारोपण एवं विशेष प्राचीन तरीके से चाल खाल बनाये जायेंगे, उस जल स्रोतों को पुनर्जीवित होने में एक दो साल तो जरूर लगेंगे पर वह दीर्घकालिक होगा । इस तरह का प्रयोग पर्यावरण के संतुलन में भागीदार होगा और क्षेत्र की पेयजल की समस्या भी दूर हो पायेगी l नौला फाउंडेशन को वैज्ञानिकों, पारिस्थितिकी वालों भूवैज्ञानिक और जलविज्ञानी की एक कोर टीम नेतृत्व प्रदान करती है, रणनीति बनाती है और पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित करने, प्राकृतिक भूजल स्तर को पुनर्जीवित करने और प्राकृतिक पर्यावरण की बहाली के लिए प्रभावी प्रबंधन, कार्यान्वयन और निगरानी सुनिश्चित करती है। नौला फाउंडेशन खीर गंगा एवं गगास नदी घाटी क्षेत्र के अपने प्रयासों से आशा करता हैं की जल्दी ही कुछ प्राकृतिक जल स्रोत एवं एक्वाइफर्स (नौला) को वर्ष भर पुनर्जीवित करने में भी सक्षम होंगे । हम खुश होंगे अगर हम आपके और दूसरों के साथ अपना अनुभव साझा कर सकें ताकि पूरे पहल को पूरे उत्तराखंड में बढ़ावा दिया जा सके। हम ऐसी गतिविधियों को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं जो हमारे भविष्य के लिए बेहतर वातावरण प्रदान करते हैं।

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