चारो दिशाओं को जोड़ने वाले भगवान राम और योगीराज कृष्ण हैं सभी के प्रेरक:शिवकुमार


चंडीगढ़(Abtaknews.com)21फरवरी,2021:33 कोटि देवी-देवताओं का वर्णन हमारे आध्यात्मिक इतिहास में मिलता है। इसमें दो महापुरुषों का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। वो हैं भगवान राम और योगीराज कृष्ण। एक उत्तर को दक्षिण से जोड़ते हैं और दूसरे पूर्व से पश्चिम को मिलाते हुए दिखाई देतें हैं। अपना समाज श्रीराम के आदर्शों को दिन-रात अपने जीवन में जीने का प्रयत्न करता है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य राम मन्दिर का निर्माण भारतीय समाज-मन की शाश्वत प्रेरणा है। इसके लिए हिन्दू समाज ने 492 वर्षों तक अनवरत संघर्ष किया है।                        इतिहास के पन्नो से ....अतीत में 76 संघर्ष हुए। चार लाख से अधिक लोगों का बलिदान हुआ। 22 दिसम्बर 1949 को राम जन्मस्थान पर मध्य के गुम्बद में श्रीराम लला-मूर्ति का प्राकट्य हो गया। तब से वहां पर श्री रामलला का दर्शन पूजन निरन्तर हो रहा है। 1984 में विश्व हिन्दू परिषद द्वारा दिल्ली में प्रथम धर्म संसद का आयोजन किया गया। इसमें भारत के पूज्य सन्तों ने श्रीराम जन्मस्थान को मुक्त कराकर वहां भव्य राम मन्दिर बनाने का आह्वान किया तथा 'श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति' का गठन किया। भारत के संतों के निर्देशानुसार ही यह 77वां आंदोलन सफलता तक पहुंचा है।

अभियानों के माध्यम से समाज को किया जागृत:
भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण को लेकर समाज के लोगों को जागरुक करने केलिए समय-समय पर विभिन्न अभियान चलाए गए। 1984 में देशभर में राम जानकी रथ यात्राओं का आयोजन किया गया। यह इन्हीं अभियानों का प्रभाव था कि हिन्दू समाज के बढ़ते दबाव के कारण 1 फरवरी 1986 को मंदिर के ताले खोलने का आदेश मिल गया। सन् 1989 में 6.25 करोड़ नागरिकों द्वारा 2.5 लाख गांवों से पूजित शिलाएं मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या भेजी गई। पूरा समाज राममय हो गया। 9 नवम्बर 1989 को राम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर के लिए शिलान्यास समारोह में पूज्य सन्तों की उपस्थिति में प्रथम शिला अनुसूचित जाति के बन्धु श्री कामेश्वर चौपाल ने रखी। 

1990 की कार सेवा ने सरकारों के अहंकार को भंग कर दिया। हजारों शौर्य सम्पन्न युवकों के अद्भुत पराक्रम और बलिदानों के फलस्वरूप दिसम्बर 1992 में दासता का वह विवादित ढांचा धराशायी कर दिया। इससे भव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्वर्गीय अशोक जी सिंघल कि यह श्रद्धा थी कि 'राम मंदिर के निर्माण में ही राम राज्य की संकल्पना निहित है।'

 न्यायालय के द्वार पर: 
संत तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं..
'होई है सोई जो राम रचि राखा'
यह विषय न्यायालयों की लम्बी प्रक्रिया में फंस गया था किंतु अंत मे वयोवृद्ध अधिवक्ता श्री केशव पारासरन व अन्य कुशल अधिवक्ताओं ने अनथक परिश्रम से सर्वोच्च न्यायालय में विजय प्राप्त की।
पौराणिक साक्ष्यों, पुरातात्विक उत्खनन, रडार तरंगों की फोटो तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर उच्चतम न्यायालय की 5 सदस्यीय पीठ ने सर्व सम्मति से कहा कि 'यह 14000 वर्ग फुट भूमि रामलला की है।Ó 
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सत्य और धर्म की हुई जय (सत्यमेव जयते), शुरू हुआ मंदिर निर्माण 
हिंदू समाज के 492 वर्ष के लंबे संघर्ष व लाखों रामभक्तों के बलिदान के बाद आखिरकार सत्य व धर्म की जीत हुई और रामलला को उनका स्थान मिल ही गया। भारत सरकार ने 5 फरवरी को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन कर अधिग्रहित 70 एकड़ भूमि न्यास को सौंप दी। 25 मार्च 2020 को रामलला तिरपाल के मंदिर से बाहर आकर अस्थाई नवीन मंदिर में विराजमान हुए। 
सपनों को साकार होते देखा: 
5 अगस्त 2020 को पूज्य महन्त नृत्यगोपाल दास जी सहित देश भर की 36 विभिन्न आध्यात्मिक धाराओं के प्रतिनिधि पूज्य सन्तों व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पू. डॉ. मोहन भागवत जी के पावन सानिध्य में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भूमि पूजन कर मन्दिर निर्माण का सूत्रपात कर दिया। देश की 3000 से अधिक पवित्र नदियों के जल तथा विभिन्न तीर्थों, जाति-जनजातियों के श्रद्धा-केन्द्रों, ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों तथा बलिदानी कारसेवकों के गृह-स्थानों से लाई गई पवित्र मिट्टी से 'भूमि पूजन' हुआ। पूज्य संतों ने यह आह्वान किया कि अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर बनने के साथ-साथ ही जन-जन के हृदयों में भी राम मंदिर बने। श्रीराम 14 वर्षों तक नंगे पैर वन-वन घूमे। असुरों का संहार तो किया ही समाज में मर्यादाओं की नींव भी रखी। अपने जीवन के प्रसंग सभी उन लोगों से जोड़े जिनकी गिनती अनुसूचित जाति अथवा जनजाति में होती थी। भगवान राम समरसता के वाहक थे। केवट उनको नदी पार करते हैं और भगवान राम उसको भवसागर पार तार देते हैं। शबरी का जीवन तो जैसे कि इंतजार ही बन गया था। भगवान शबरी के झूठे बेर स्वीकार करते हैं। श्रीराम ने अहिल्या-उद्धार कर नारी की गरिमा को पुनस्र्थापित किया। रावण का विनाश कर अधर्म व आतंकवाद का जड़ से नाश कर धर्म की स्थापना की। राम राज्य में सब प्रसन्न थे। ऐसा ही भारत हमें पुन: बनाना है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण ही मात्र लक्ष्य नहीं है बल्कि पुन: अखंड भारत का निर्माण कर रामराज्य स्थापित करना लक्ष्य है।

*निधि समर्पण अभियान धन एकत्रित करना नहीं राम मंदिर में आम जन की भागीदारी सुनिश्चित करना है उद्देश्य:
भगवान राम जी कार्य में पूरी वानर सेना ने अपना योगदान दिया। हनुमान जी माता सीता का पता लगाने लंका जाते हैं और रावण की सोने की लंका को राख कर देते हैं। अंगद रावण के अहंकार को चुनौती देते हैं। जामवंत बुजुर्ग होने के नाते वानरों का मार्गदर्शन करते हैं। सुग्रीव अपनी पूरी सेना को भगवान के काम के लिए समर्पित करते हैं। नल और नील पुल के निर्माण की योजना बनाते हैं। इसी प्रकार वर्तमान परिस्थिति भी हमें समपर्ण व सहयोग करने का आह्वान करती है। मंदिर निर्माण में अपने योगदान के लिए सम्पूर्ण विश्व का हिन्दू समाज तैयार है। छोटे-बड़े सभी प्रकार के दान प्राप्त हो रहे हैं। रामसेतु के निर्माण में गिलहरी की भूमिका का भी आदर हुआ था। राम मंदिर निर्माण का यह भगवत् कार्य भी जन-जन के व्यापक सहयोग से ही सम्पन्न होगा। हम भी अपना योगदान तय करें और भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए जो भी रामभक्त हमारे घर आएं उनको ससम्मान अपनी निधि समर्पण भेंट करें। क्योंकि निधि समर्पण अभियान का उद्देश्य धन एकत्रित करना नहीं बल्कि राम मंदिर निर्माण में आम जन की भागीदारी सुनिश्चित करना है।  
राम वन गए तो राम जी बन गए।
हम भी घर-घर जाएंगें तो भवसागर से तर जाएंगें।
जय श्री राम

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