मातृभूमि को मुगलों से मुक्त कराने की अटूट प्रतिज्ञा लेने वाले पराक्रमी राजा महाराणा प्रताप का नाम लेकर करें दिन का शुभारंभ

मुंबई(abtaknews.com)22 फरवरी,2021: महाराणा प्रताप जिनका नाम लेकर दिन का शुभारंभ करे, ऐसे नामों में एक हैं, महाराणा प्रताप । उनका नाम उन पराक्रमी राजाओं की सूचि में सुवर्ण अक्षरों में लिखा गया हैं जो देश, धर्म, संस्कृति तथा इस देश की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु जीवनभर जूझते रहे ! उनकी वीरता की पवित्र स्मृति को यह विनम्र अभिवादन है। मेवाड के महान राजा, महाराणा प्रताप सिंह का नाम कौन नहीं जानता ? भारत के इतिहास में यह नाम वीरता, पराक्रम, त्याग तथा देशभक्ति जैसी विशेषताओं हेतु निरंतर प्रेरणादायी रहा है । मेवाड के सिसोदिया परिवार में जन्मे अनेक पराक्रमी योद्धा, जैसे बाप्पा रावल, राणा हमीर, राणा सांगा को ‘राणा’ यह उपाधि दी गई; अपितु ‘महाराणा’ उपाधि से केवल प्रताप सिंह को सम्मानित किया गया।

महाराणा प्रताप का बचपन -- महाराणा प्रताप का जन्म वर्ष 1540 में हुआ । मेवाड के राणा उदय सिंह, द्वितीय, के 33 बच्चे थे । उनमें प्रताप सिंह सबसे बडे थे । स्वाभिमान तथा धार्मिक आचरण प्रताप सिंह की विशेषता थी । महाराणा प्रताप बचपन से ही दृढप्रतिज तथा बहादुर थे; बडा होने पर यह एक महापराक्रमी पुरुष बनेगा, यह सभी जानते थे । सर्व साधारण शिक्षा लेने से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उसे अधिक रुचि थी ।

#Start the day by taking the name of the mighty king Maharana Pratap, who took unwavering pledge to free the motherland from the Mughals

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक -- महाराणा प्रताप सिंह के काल में देहली पर अकबर बादशाह का शासन था । हिंदू राजाओं की शक्ति का उपयोग कर दूसरे हिंदू राजाओं को अपने नियंत्रण में लाना, यह उसकी नीति थी । कई राजपूत राजाओं ने अपनी महान परंपरा तथा लडने की वृत्ति छोडकर अपनी बहुओं तथा कन्याओं को अकबर के अंत:पूर में भेजा ताकि उन्हें अकबर से इनाम तथा मान सम्मान मिलें । अपनी मृत्यु से पहले उदय सिंह ने उनकी सबसे छोटी पत्नी का बेटा जगमाल को राजा घोषित किया; जबकि प्रताप सिंह जगमाल से बडे थे, प्रभु रामचंद्र जैसे अपने छोटे भाई के लिए अपना अधिकार छोडकर मेवाड से निकल जाने को तैयार थे । किंतु सभी सरदार राजा के निर्णय से सहमत नहीं हुए । अत: सबने मिलकर यह निर्णय लिया कि जगमाल को सिंहासन का त्याग करना पडेगा। महाराणा प्रताप सिंह ने भी सभी सरदार तथा लोगों की इच्छा का आदर करते हुए मेवाड की जनता का नेतृत्व करने का दायित्व स्वीकार किया।

महाराणा प्रताप की अपनी मातृभूमि को मुक्त कराने की अटूट प्रतिज्ञा -- महाराणा प्रताप के शत्रुओं ने मेवाड को चारों ओर से घेर लिया था । महाराणा प्रताप के दो भाई, शक्ति सिंह एवं जगमाल अकबर से मिले हुए थे । सबसे बडी समस्या थी आमने- सामने लडने हेतु सेना खडी करना, जिसके लिए बहुत धन की आवश्यकता थी। महाराणा प्रताप की सारी संदूके खाली थीं, जबकि अकबर के पास बहुत बडी सेना, अत्यधिक संपत्ति तथा और भी सामग्री बडी मात्रा में थी । किंतु महाराणा प्रताप निराश नहीं हुए अथवा कभी भी ऐसा नहीं सोचा कि वे अकबर से किसी बात में कम हैं।

महाराणा प्रताप को एक ही चिंता थी, अपनी मातभूमि को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराना था । एक दिन उन्होंने अपने विश्वास के सारे सरदारों की बैठक बुलाई तथा अपने गंभीर एवं वीरता से भरे शब्दों में उनसे आवाहन किया । उन्होंने कहा,‘ मेरे बहादुर बंधुओं, अपनी मातृभूमि, यह पवित्र मेवाड अभी भी मुगलों के चंगुल में है । आज मैं आप सबके सामने प्रतिज्ञा करता हूं कि, जब तक चितौड मुक्त नहीं हो जाता, मैं सोने अथवा चांदी की थाली में खाना नहीं खाऊंगा, मुलायम गद्दे पर नहीं सोऊंगा तथा राजप्रसाद में भी नहीं रहुंगा; इसकी अपेक्षा मैं पत्तलपर खाना खाऊँगा, जमीन पर सोउंगा तथा झोपडे में रहुंगा । जब  तक चितौड मुक्त नहीं हो जाता, तब तक मैं दाढी भी नहीं बनाउंगा । मेरे पराक्रमी वीरों, मेरा विश्वास है कि आप अपने तन-मन-धन का त्याग कर यह प्रतिज्ञा पूरी होने तक मेरा साथ दोगे । अपने राजा की प्रतिज्ञा सुनकर सभी सरदार प्रेरित हो गए, तथा उन्होंने अपने राजा की तन-मन-धन से सहायता करेंगे तथा शरीर में  रक्त की आखरी बूंद तक उसका साथ देंगे; किसी भी परिस्थिति में मुगलों से चितौड मुक्त होने तक अपने ध्येय से नहीं हटेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा की  । उन्होंने महाराणा से कहा, विश्वास करो, हम सब आपके साथ हैं, आपके एक संकेत पर अपने प्राण न्यौछावर कर देंगे।

 हल्दी घाट की लडाई : महाराणा प्रताप, एक महान योद्धा --अकबर ने महाराणा प्रताप को अपने चंगुल में लाने का अथक प्रयास किया किंतु सब व्यर्थ सिद्ध हुआ! महाराणा प्रताप के साथ जब कोई समझौता नहीं हुआ, तो अकबर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने युद्ध घोषित किया । महाराणा प्रताप ने भी सिद्धताएं आरंभ कर दी । उसने अपनी राजधानी अरावली पहाड के दुर्गम क्षेत्र कुंभलगढ में स्थानांतरित की । महाराणा प्रताप ने अपनी सेना में आदिवासी तथा जंगलों में रहने वालों को भर्ती किया । इन लोगों को युद्ध का कोई  अनुभव नहीं था, किंतु उसने उन्हें प्रशिक्षित किया । उसने सारे राजपूत सरदारों को मेवाड के स्वतंत्रता के झंडे के नीचे इकट्ठा होने हेतु आवाहन किया।

महाराणा प्रताप के 22,000 सैनिक अकबर की 80,000 सेना से हलदी घाट में भिडे । महाराणा प्रताप तथा उसके सैनिकों ने युद्ध में बडा पराक्रम दिखाया किंतु उसे पीछे हटना पडा। अकबर की सेना भी राणा प्रताप की सेना को पूर्णरूप से पराभूत करने में असफल रही । महाराणा प्रताप एवं उसका विश्वसनीय घोडा ‘ चेतक ’ इस युद्ध में अमर हो गए । हल्दी घाट के युद्ध में ‘ चेतक ’ गंभीर रुप से घायल हो गया था; किंतु अपने स्वामी के प्राण बचाने हेतु उसने एक नहर के उस पार लंबी छलांग लगाई । नहर के पार होते ही ‘ चेतक ’ गिर गया और वहीं उसकी मृत्यु  हुई । इस प्रकार अपने प्राणों को संकट में डालकर उसने राणा प्रताप के प्राण बचाएं । लोह पुरुष महाराणा अपने विश्वसनीय घोडे की मृत्यू पर एक बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोया । तत्पश्चात जहां चेतक ने अंतिम सांस ली थी वहां उसने एक सुंदर उद्यान का निर्माण किया । अकबर ने महाराणा प्रताप पर आक्रमण किया किंतु छह महिने युद्ध के उपरांत भी अकबर महाराणा को पराभूत न कर सका; तथा वह देहली लौट गया । अंतिम उपाय के रूप में अकबर ने एक पराक्रमी योद्धा सरसेनापति जगन्नाथ को 1584 में बहुत बडी सेना के साथ मेवाड पर भेजा, दो वर्ष के अथक प्रयासों के पश्चात भी वह राणा प्रताप को नहीं पकड सका।

महाराणा प्रताप का कठोर प्रारब्ध -- जंगलों में तथा पहाडों की घाटियों में भटकते हुए राणा प्रताप अपना परिवार अपने साथ रखते थे । शत्रू के कहीं से भी तथा कभी भी आक्रमण करने का संकट सदैव  बना रहता था । जंगल में ठीक से खाना प्राप्त होना बडा कठिन था । कई बार उन्हें खाना छोड-कर, बिना खाए-पिए ही प्राण बचाकर जंगलों में भटकना पडता था । शत्रू के आने की खबर मिलते ही एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर भागना पडता था । वे सदैव किसी न किसी संकट से घिरे रहते थे ।  एक बार महारानी जंगल में रोटियां  सेंक रही थी; उनके खाने के बाद उसने अपनी बेटी से कहा कि, बची हुई रोटी रात के खाने के लिए रख दे; किंतु उसी समय एक जंगली बिल्ली ने झपट्टा मारकर रोटी छीन ली और राजकन्या असहायता से रोती रह गई । रोटी का वह टुकडा भी उसके प्रारब्ध में नहीं था । राणा प्रताप को बेटी की यह स्थिति देखकर बडा दुख हुआ, अपनी वीरता, स्वाभिमान पर उसे बहुत क्रोध आया तथा विचार करने लगा कि उसका युद्ध करना कहां तक उचित है ! मन की इस दुविधा स्थिति में उसने अकबर के साथ समझौता करने की बात मान ली । पृथ्वीराज, अकबर के दरबार का एक कवि जिसे राणा प्रताप बडा प्रिय था, उसने राजस्थानी भाषा में राणा प्रताप का आत्मविश्वास बढाकर उसे अपने निर्णय से परावृत्त करने वाला पत्र कविता के रुप में लिखा । पत्र पढकर राणा प्रताप को लगा जैसे उसे 10,000 सैनिकों का बल प्राप्त हुआ हो । उसका मन स्थिर तथा शांत हुआ । अकबर की  शरण में जाने का विचार उसने अपने मन से निकाल दिया तथा अपने ध्येयसिद्धि हेतु सेना अधिक संगठित करने के प्रयास आरंभ किए ।

भामाशाह की महाराणा के प्रति भक्ति महाराणा प्रताप के वंशजोें के दरबार में एक राजपूत सरदार था । राणा प्रताप जिन संकटों से मार्गक्रमण कर रहा था तथा जंगलों में भटक रहा था, इससे वह बडा दुखी हुआ । उसने राणा प्रताप को  ढेर सारी संपत्ति दी, जिससे वह 25,000 की सेना 12 वर्ष तक रख सके । महाराणा प्रताप को बडा आनंद हुआ एवं कृतज्ञता भी लगी । आरंभ में महाराणा प्रताप ने भामा शाह की सहायता स्वीकार करने से मना किया किंतु उनके बार-बार कहने पर राणा ने संपात्ति का स्वीकार किया । भामाशाह से धन प्राप्त होने के पश्चात राणा प्रताप को दूसरे स्रोत से धन प्राप्त होना आरंभ हुआ । उसने सारा धन अपनी सेना का विस्तार करने में लगाया तथा चित्तौड़ छोडकर मेवाड को मुक्त किया ।

महाराणा प्रताप की अंतिम इच्छा --- महाराणा प्रताप की मृत्यु हो रही थी, तब वे घास के बिछौने पर सोए थे, क्योंकि चित्तौड़ को मुक्त करने की उनकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी । अंतिम क्षण उन्होंने अपने बेटे अमर सिंह का हाथ अपने हाथ में लिया तथा चित्तौड़ को मुक्त करने का दायित्व  उसे सौंप कर शांति से पर लोक सिधारे । क्रूर बादशाह अकबर के साथ उनके युद्ध की इतिहास में कोई तुलना नहीं । जब लगभग पूरा राजस्थान मुगल बादशाह अकबर के नियंत्रण में था, महाराणा प्रताप ने मेवाड को बचाने के लिए 12 वर्ष युद्ध किया । अकबर ने महाराणा को पराभूत करने के लिए बहुत प्रयास किए किंतु अंत तक वह अपराजित ही रहा । इस के अतिरिक्त उसने राजस्थान का बहुत बडा क्षेत्र मुगलों से मुक्त किया । कठिन संकटों से जाने के पश्चात भी उसने अपना तथा अपनी मातृभूमि का नाम पराभूत होने से बचाया । उनका पूरा जीवन इतना उज्वल था कि स्वतंत्रता का दूसरा नाम ‘ महाराणा प्रताप ’ हो सकता है । उनकी पराक्रमी स्मृति को हम श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।



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