छठ महापर्व आस्था में होता है एक आलौकिक पॉजिटिविटी का आभास: डा एम पी सिंह

फरीदाबाद(abtaknews.com)21नवम्बर,2020:फरीदाबाद सेक्टर 23 संजय कॉलोनी में लखानी चौक के पास अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा एम पी सिंह ने बताया कि जब भी आप अपनी आस्था रखते हैं तो आप को एक आलौकिक पॉजिटिविटी का आभास होता है ये ईश्वर की कृपा से ही होता है हम सब एक ही प्रभु की सन्तान हैं वो भी सर्व व्यापी हैं बस आप को एक संकल्प लेना चाहिए कि आप कभी गलत काम ना करें और ना ही झूठ बोले हमारे कर्म अच्छे हैं तो हमें भगवान हमेशा खुश रखेंगे ।ट्रस्ट के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष पंङित तरसेम वत्स स ने बताया
छठ पूजा (Chhath Puja) का प्रारंभ दो दिन पूर्व चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है, फिर पंचमी को लोहंडा और खरना होता है. उसके बाद षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है, जिसमें सूर्य देव (Surya Dev) को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है आज छठ पूजा का दूसरा दिन खरना होता है
हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को त्योहारों की माला माना जाता है. पांच दिन तक चलने वाला ये पर्व सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह पर्व छठ पूजा (Chhath Puja) तक चलता है. उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में मनाया जाने वाला ये पर्व अपने आप में काफी खास है. इसे पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है. छठ पूजा चार दिन तक चलती है. सूर्य देव (Surya Dev) की आराधना और संतान के सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा हर वर्ष का​र्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होती है
छठ पूजा का प्रारंभ दो दिन पूर्व चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से होता है, फिर पंचमी को लोहंडा और खरना होता है. उसके बाद षष्ठी तिथि को छठ पूजा होती है, जिसमें सूर्य देव को शाम का अर्घ्य अर्पित किया जाता है. इसके बाद अगले दिन सप्तमी को सूर्योदय के समय में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और फिर पारण करके व्रत को पूरा किया जाता है. नहाय-खाय से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है
छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं. पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है. कहते हैं राजा प्रियंवद की कोई संतान नहीं थी. तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वह पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ. प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वह सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं. उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा.
सीता जी ने 6 दिनों तक सूर्यदेव की उपासना की
राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है. इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम और सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला किया था. पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया. मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर उन्हें पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया. उस समय सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर 6 दिनों तक भगवान सूर्यदेव की पूजा की थी.
इस मौके पर ट्रस्ट के फाउंडर हृदेश सिंह ने विदेश से वीडियो कॉल के माध्यम से सभी को शुभकामनाएं दीं और कोरोना वाइरस से बचाव के लिए निर्देश भी दिया बताया कि बिना मास्क के ना जाएं व कम से कम 2 गज की दूरी पर ही रहें राजन कुमार, मनीष तिवारी, सुजीत तिवारी, शशि चन्द्र पुष्पेंद्र सिंह ,मनीषा देवी बेबी देवी व अन्य बहुत से लोग उपस्थित रहे
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जब विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता की स्त्रियां अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ सज-धज कर अपने आँचल में फल ले कर निकलती हैं तो लगता है जैसे संस्कृति स्वयं समय को चुनौती देती हुई कह रही हो, "देखो! तुम्हारे असँख्य झंझावातों को सहन करने के बाद भी हमारा वैभव कम नहीं हुआ है, हम सनातन हैं, हम भारत हैं। हम तबसे हैं जबसे तुम हो, और जबतक तुम रहोगे तबतक हम भी रहेंगे।"
जब घुटने भर जल में खड़ी व्रती की सिपुलि में बालक सूर्य की किरणें उतरती हैं तो लगता है जैसे स्वयं सूर्य बालक बन कर उसकी गोद में खेलने उतरे हैं। स्त्री का सबसे भव्य, सबसे वैभवशाली स्वरूप वही है। इस धरा को "भारत माता" कहने वाले बुजुर्ग के मन में स्त्री का यही स्वरूप रहा होगा। कभी ध्यान से देखिएगा छठ के दिन जल में खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे रही किसी स्त्री को, आपके मन में मोह नहीं श्रद्धा उपजेगी।
छठ वह प्राचीन पर्व है जिसमें राजा और रंक एक घाट पर माथा टेकते हैं, एक देवता को अर्घ देते हैं, और एक बराबर आशीर्वाद पाते हैं। धन और पद का लोभ मनुष्य को मनुष्य से दूर करता है, पर धर्म उन्हें साथ लाता है।
अपने धर्म के साथ होने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि आप अपने समस्त पुरुखों के आशीर्वाद की छाया में होते हैं। छठ के दिन नाक से माथे तक सिंदूर लगा कर घाट पर बैठी स्त्री अपनी हजारों पीढ़ी की अजियासास ननियासास की छाया में होती है, बल्कि वह उन्ही का स्वरूप होती है। उसके दउरे में केवल फल नहीं होते, समूची प्रकृति होती है। वह एक सामान्य स्त्री सी नहीं, अन्नपूर्णा सी दिखाई देती है। ध्यान से देखिये! आपको उनमें कौशल्या दिखेंगी, उनमें मैत्रेयी दिखेगी, उनमें सीता दिखेगी, उनमें अनुसुइया दिखेगी, सावित्री दिखेगी... उनमें पद्मावती दिखेगी, उनमें लक्ष्मीबाई दिखेगी, उनमें भारत माता दिखेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके आँचल में बंध कर ही यह सभ्यता अगले हजारों वर्षों का सफर तय कर लेगी।
छठ डूबते सूर्य की आराधना का पर्व है। डूबता सूर्य इतिहास होता है, और कोई भी सभ्यता तभी दीर्घजीवी होती है जब वह अपने इतिहास को पूजे। अपने इतिहास के समस्त योद्धाओं को पूजे और इतिहास में अपने विरुद्ध हुए सारे आक्रमणों और षड्यंत्रों को याद रखे।
छठ उगते सूर्य की आराधना का पर्व है। उगता सूर्य भविष्य होता है, और किसी भी सभ्यता के यशश्वी होने के लिए आवश्यक है कि वह अपने भविष्य को पूजा जैसी श्रद्धा और निष्ठा से सँवारे... हमारी आज की पीढ़ी यही करने में चूक रही है, पर उसे यह करना ही होगा... यही छठ व्रत का मूल भाव है। 
मैं खुश होता हूँ घाट जाती स्त्रियों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उनके लिए राह बुहारते पुरुषों को देख कर, मैं खुश होता हूँ उत्साह से लबरेज बच्चों को देख कर... सच पूछिए तो यह मेरी खुशी नहीं, मेरी मिट्टी, मेरे देश, मेरी सभ्यता की खुशी है।
मेरे देश की माताओं! परसों जब आदित्य आपकी सिपुलि में उतरें, तो उनसे कहिएगा कि इस देश, इस संस्कृति पर अपनी कृपा बनाये रखें, ताकि हजारों वर्ष बाद भी हमारी पुत्रवधुएँ यूँ ही सज-धज कर गंगा के जल में खड़ी हों और कहें- "उगs हो सुरुज देव, भइले अरघ के बेर..."
जय हो....
रोगी बालक के माता-पिता सुनें तो षष्ठी देवी के प्रसाद से १ मास में ही बालक रोगमुक्त होता है।
ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड
नारद! प्रकृति देवी के एक प्रधान अंश को ‘देवसेना’ कहते हैं। मातृकाओं में ये परम श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें लोग भगवती ‘षष्ठी’ के नाम से कहते हैं। प्रत्येक लोक में शिशुओं का पालन एवं संरक्षण करना इनका प्रधान कार्य है। ये तपस्विनी, विष्णुभक्ता तथा कार्तिकेय जी की पत्नी हैं। ये साध्वी भगवती प्रकृति का छठा अंश हैं। अतएव इन्हें ‘षष्ठी’ देवी कहा जाता है। संतानोत्पत्ति के अवसर पर अभ्युदय के लिये इन षष्ठी योगिनी की पूजा होती है। अखिल जगत में बारहों महीने लोग इनकी निरन्तर पूजा करते हैं। पुत्र उत्पन्न होने पर छठे दिन सूतिकागृह में इनकी पूजा हुआ करती है– यह प्राचीन नियम है। कल्याण चाहने वाले कुछ व्यक्ति इक्कीसवें दिन इनकी पूजा करते हैं। इनकी मातृ का संज्ञा है। ये दयास्वरूपिणी हैं। निरन्तर रक्षा करने में तत्पर रहती हैं। जल, थल, आकाश, गृह– जहाँ कहीं भी बच्चों को सुरक्षित रखना इनका प्रधान उद्देश्य है।

1 comment:

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