मोदी सरकार द्वारा देश में नयी शिक्षा नीति: सुधार एवं सुझाव: डा हरित बैंसला



पलवल / फरीदाबाद(Abtaknews.com) 18सितंबर, 2020 : मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित नयी शिक्षा नीति १९८६ में जारी हुई शिक्षा प्रणाली को नया बदलाव प्रदान करती हैं जिसका हम स्वागत करते हैं यद्यपि इसमें काफ़ी सुधारो की आवश्यकता भी हैं। एक युवा देश के युवाओं में व्यक्तित्व निर्माण ओर सर्वांगीण विकास, समाज की उन्नति तथा समाज के सभ्यताओं के बहुपक्षिय विकास को ध्यान में रख कर शिक्षा नीति की प्रस्तावना होनी चाहिए। अनेको सकरात्मक ओर संरचनात्मक बदलावों के साथ साथ कुछ नकारात्मक पहलू भी इस नीति का हिस्सा हैं। जिस प्रकार डा० अल्तेकर ने कहा हैं,ज्ज्शिक्षा को प्रकाश ओर शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता हैं जो हमारी शारीरिक, मानसिक, भौतिक, ओर आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का निरंतर एवं समजस्यपूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करता हैं ओर उत्कृष्ट बनाता हैंज्ज्। मेरा निजी मत हैं की कही ना कही शिक्षा नीति में वैदिक शिक्षा पद्धति को व्यक्ति के नैतिक, सांस्कृतिक, एवं सभ्यता की उन्नति के लिए कुछ हद तक सम्मलित कर लेना एक बेहतर विचार होता। लगातार युवाओं में नेतिकता का पतन, अपनी संस्कृति से अलगाव जैसी एक नयी बीमारी ने जन्म ले लिया हैं। वैदिकता से मेरा तात्पर्य यह है की नयी शिक्षा नीति में वेद, वेदांग, दर्शन, नीतिशास्त्र, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दंडनीति, सैन्यशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद और आयुर्वेद आदि सभी विषयों के थोड़े थोड़े अंशो को समायोजित कर एक युवा का सर्वांगीण विकास में असरदार साबित हो सकता हैं। उदाहरण सरूप ईसाई मठों में पहले धर्मशिक्षा और प्रार्थना के साथ पढ़ना लिखना, गाना, पूजा करना और गणित की शिक्षा दी जाती थी किंतु इसके पश्चात्‌ वहाँ लातिन का व्याकरण, ज्यामिति, ज्योतिष और संगीत का मिलाकर सात ज्ञानविस्तारक कलाओं के शिक्षण का क्रम चला और तभी से इन शास्त्रों के लिये (आर्ट) शब्द का प्रयोग चल पड़ा जो आजकल भ्रामक रूप से हमारे विश्वविद्यालयों की उपाधि में प्रयुक्त हो रहा है। मेरा मानना हैं ओर बुद्धिजीवियों के लिए विचारणीय भी हैं की यदि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उस वक्त राजनीति में दख़ल किया होता तो निश्चित ही आज देश का नैतिक पतन नही होता। हम प्राचीन शिक्षा नीति पे एक नज़र डाले तो भारतीय समाज ने एक मौलिक चिंतन के बलबूते पर एक उन्नत एवं वयस्थित शिक्षा प्रणाली को खड़ा किया था तथा प्राचीन काल में शिक्षा को उत्तम जीवन यापन तथा मोक्ष की प्राप्ति का बेहतरीन साधन समझा जाता था जो की अब गुण, ज्ञान से दूर रोज़गार के लिए भटकती नज़र आती हैं। जाह तक शिक्षा में वैदिकता के चलन की बात हैं तो यह स्पष्ट कर देना चाहता हू को वैदिक युग में शिक्षा को लेकर यही धारणा थी की यह मानवीय जीवन के विभिन्न प्रसंगों में व्यक्ति को पथ-प्रदर्शित करती हैं।आज का युवा ज्ञान के लिए कम बल्कि पास होने ओर रोज़ग़र प्राप्त करने की सोच से ज़्यादा पढ़ता है। यह प्रशंसनीय है की शिक्षण के माध्यम के रूप में पहली से पांचवीं तक मातृभाषा का इस्तेमाल किया जायेगा। इसमें रट्टा विद्या को ख़त्म करने की भी कोशिश की गई है जिसको मौजूदा व्यवस्था की बड़ी खामी माना जाता रहा हैं। एक बेहतरीन पहल इस शिक्षा नीति में यह भी है की किसी कारणवश विद्यार्थी उच्च शिक्षा के बीच में ही कोर्स छोड़ के चले जाते थे तो ऐसा करने पर उन्हें कुछ नहीं मिलता एवं उन्हें डिग्री के लिये दोबारा से नई शुरुआत करनी पड़ती थी मगर इस नई नीति में पहले वर्ष में कोर्स को छोड़ने पर प्रमाणपत्र व दूसरे वर्ष पे छोड़ने पे डिप्लोमा एवं अंतिम वर्ष पे छोड़ने पे डिग्री देने का प्रावधान है। यह एक अनुकरणीय पहल है। 

इस नई शिक्षा नीति मे मानव संसाधन मंत्रालय का नाम पुनः "शिक्षा मंत्रालय" करने का फैसला जो लिया गया यह एक सकरात्मक पहल है क्योंकि मानव (व्यक्ति) को संसाधन से जोड़कर देखना मै उचित नही मानता ओर यह होना भी चाहिए था। एक अन्य अनूठी पहल ये भी रही की इसमें समस्त उच्च शिक्षा (क़ानून एवं चिकित्सीय शिक्षा को छोड़कर) के लिए एक एकल निकाय के रूप में भारत उच्च शिक्षा आयोग का गठन निश्चित हि प्रशंसनिय हैं। भारत का उच्च शिक्षा तंत्र अमेरिका, चीन के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उच्च शिक्षा तंत्र है। जब सरकार शिक्षा तंत्र पर सकल घरेलू उत्पाद का कुल ६ प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य लेकर चलती हैं ओर ऐसा विचार यदि करती है तो इसका परिणाम यह भी होना चाहिए की केवल प्राथमिक ही नही बल्कि उच्च शिक्षा भी निशुल्क  होनी चाहिए। अभी तक सरकार का जो सकल घरेलू उत्पाद का  ४.४३त्न शिक्षा पर खर्च करना उद्देश रहा हैं इसमें वृद्धि करना भी एक सकरात्मक पहल का हिस्सा हैं।एक रिपोर्ट अनुसार विगत ५० वर्षों में देश के विश्वविद्यालयों की संख्या में ११.६ गुना, महाविद्यालयों में १२.५ गुना, विद्यार्थियों की संख्या में ६० गुना और शिक्षकों की संख्या में २५ गुना वृद्धि हुई है। सभी को उच्च शिक्षा के समान अवसर सुलभ कराने की नीति के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश में महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उच्च शिक्षा का ज़िक्र करे तो मेरा स्वयं एक शोधार्थी होते हुए यह मत की एम० फ़िल० को समाप्त नही किया जाना चाहिए था। इसके पीछे  ख़ास वजह यह हैं की जब कोई भी युवा अपनी स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल कर लेता हैं तो वो वह शोध के इतना परिपक्व नही होता ओर उसे पी० एच० ड़ी० में एकदम से प्रवेश से वो जटिलता का सामना करत हैं। एम फ़िल एक ऐसा कोर्स होता हैं जो शिक्षार्थी को बहुत कुछ सिखाता हैं ओर अधिक परिपक्वता प्रदान कर पी एच डी के लिए उसका रास्ता सुलभ करता हैं।  मगर अब अनुसंधान में जाने के लिये तीन साल के स्नातक डिग्री के बाद एक साल स्नातकोत्तर करके में प्रवेश लिया जा सकने की इस पहल को कुछ हद तक ठीक नही मानता। हमारे देश को शायद नयी शिक्षा नीति की नही बल्कि नयी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता हैं। मेरा इशारा स्कूल, कोलिज के भवन निर्माण, व ढाँचागत व्यवस्था की तरफ़ हैं। जब तक स्कूल में साफ़ पेय जल, शोचलय निर्माण, जर्जर भवनो की मरम्मत ही नही होगी तब तक इन नीतियों का किस हद तक फ़ायदा होने वाला हैं ये आप समझ सकते हैं। सरकार को सरकारी स्कूल के सुधार को लेकर बहुत सारे नए बदलावों की आवश्यकता हैं। सबसे मुख्य विषय विधलयो, महाविधालयो, विश्वविद्यालयों में व्यापक स्तर पर अध्यापक़ो की कमी हैं। देश के लिए जब नयी नीति बनाई गयी तो सरकार यह भी एक संशोधन करना था जिसमे अध्यापक़ो की व्यापक स्तर की कमी को भरने की बाध्यता का ज़िक्र होता। एक सोचने वाली बात हैं जब तक किताब के अंदर क्या लिखा हैं ये बताने वाले ही नही रहेंगे तो किताब के अंदर लिखे हुए को बदलने का क्या फ़ायदा। हाल ही में कल शिक्षा मंत्रालय की रिर्पोट अनुसार देश में ४२ केंद्रिय विश्वविधलयो में १८,६६७ पद ख़ाली पड़े हैं वही अन्य विधलयो, महाविधलयो व विश्विधलयो में यह आँकड़ा लाखों के पार पहुँचा हुआ हैं।अंत में यही कहना चाहूँगा की सरकार को नयी शिक्षा नीति में वैदिक शिक्षा, स्कूल भवनो, सुविधाओं व अध्यापको की व्यापक स्तर पर कमी व अन्य पहलू जिन पर ऊपर विचार  किया गया हैं पर ध्यान देने की आवश्यकता हैं। 


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