Tuesday, January 28, 2020

परम्परागत जल सरंक्षण पद्धति को लानी होगी जल क्रांति : खेम सिंह कठायत

द्वाराहाट/दिल्ली(abtaknews.com)28 जनवरी,2020 : परंपरागत नौले धारे बचेंगे तो जल सरंक्षण के साथ हमारी पारम्परिक पहाड़ी संस्कृति व सभ्यता भी बचेगी ये कहना हैं समाजसेवी नारायण सिंह रावत का जो गगास घाटी के गांव छाना गोलू में जल संवर्धन व संरक्षण कार्यक्रम के साथ साथ स्कूली छात्रों व ग्रामीणों ने मिलकर नौला धारा साफ सफाई अभियान चलायाI समाजसेवी व नौला पर्यावरणविद
खेम सिंह कठायत ने बताया भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन का कृषि पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। जैसा की हम सभी जानते हैं की आज हमारे परम्परागत जल स्रोत नौले धारे सूखते जा रहे हैं और पानी की भयंकर कमी के चलते पहाड़ से पलायन होने की एक वजह हैं I  क्यों न हम सब मिलकर नई दिशा नई सोच के साथ हम मिलकर एक आगे बढे, और अपने अपने गांव व् आसपास के सभी प्राकृतिक जल स्रोतों को बचने के लिए नौला फाउंडेशन की मुहीम के साथ कंधे से कन्धा मिलकर चले I  ग्राम थामण इड़ा सेरा के लोगो खासकर महिला शक्ति व बालिकाओं ने श्रम दान करके एक नयी मिशाल पेश की हैं नतीजा आज हम काफी हद तक सफल भी हुये हैं I पर्यावरणविद मनोज पांडेय  ने समस्त प्रतिभागियो को जल का महत्व बताया और उनके द्वारा गगास घाटी में जैव विविधता के साथ साथ जल संवर्धन पर पिछले बीस साल से बेहतरीन कार्यो की जानकारी दी I युवा नौला पर्यावरणविद संदीप मनराल ने बताया  कालांतर में सरकारी योजनाओं के माध्यम से भूमिगत जल का दोहन कर, जल स्रोतों को बाधित कर या नदियों के प्रवाह को बांधों से रोक कर बड़ी बड़ी टंकियों में एकत्र कर घर घर तक पहुँचाने का काम शुरू हुआ। जरूरत के मुताबिक पानी जब घर पर ही उपलब्ध होने लगा तो नौलों की उपेक्षा होने लगी और हमारे पुरखों की धरोहर क्षीण-शीर्ण होकर विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई । कभी पहाड़ की पेयजल स्रोत के अलावा परंपरागत संस्कृति व संस्कार की जगह ये प्राचीन नौले धारे का उत्तराखण्ड में संसाधन उपयोग और संरक्षण में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संवेदनशीलता इत्यादि का पूरा ध्यान रखा जाता रहा है। ये धारे-नौले सदैव ही सामूहिकता, सामंजस्यता, सद्भावना और परस्पर सम्मान के वाहक रहे हैं और साथ ही, ग्राम-समाज की जीवनरेखा ये धारे, पंदेरे, मगरे और नौले प्राकृतिक ही रहे हैं। अर्थात, जहाँ प्राकृतिक रूप से पानी था, वहीं इनका निर्माण किया गया। पर इनका रिचार्ज जोन हमेशा प्राकृतिक ही होता हैं जो सदियों से सामुदायिक जल संचय और उसके संरक्षण और संवर्धन हमेशा प्राकृतिक ही होता था और पहाड़ो की ढालों में बने हुए सीढ़ीदार खेत ही प्राकृतिक चाल खाल का काम करते थे। युवा नौला पर्यावरविद गणेश कठायत ने बताया नौले सिर्फ जल स्रोत ही नहीं बल्कि हमारे जीवन मूल्य हैं जिन्हे बचाना अति आवश्यक हैं नहीं तो हमें पोषित करती संस्कृति ही खत्म हो जाएगी, यदि हम समय से न जागे। ग्रामीण जन जागरूकता कार्यशाला का आयोजन नौला फाउंडेशन ने उत्तराखंड विज्ञानं एवं शिक्षा अनुशंधान केंद्र, देहरादून के तत्वाधान में हिमालयी क्षेत्र में तेजी से सुख रहे पारम्परिक जलस्रोतों को बचाने के लिए बने बृहद समुदाय आधारित रिसर्च हिमालयन डिक्लेरेशन ऑफ़ स्प्रिंगशेड रेजुवेनशन (एचडीएसआर) के तहत किया जा रहा हैं I वरिष्ठ वैज्ञानिक व युसर्क के निदेशक डॉ. दुर्गेश पंत के अनुसार भारत सरकार, नीती आयोग की रिपोर्ट में हिमालय के सतत विकास पर कहा गया है कि लगभग 30% स्प्रिंग्स ( पारम्परिक जल स्रोत नौले धारे ), जो लोगों की जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, सूख रहे हैं और 50% ने कम निर्वहन की सूचना दी है।  देश के हिमालयी क्षेत्र में तीन मिलियन से अधिक स्प्रिंग्स को पुनर्जीवित करने के लिए एक व्यापक योजना हिमालयन डिक्लेरेशन ऑफ़ स्प्रिंगशेड रेजुवेनशन ( #एचडीएसआर ) के तहत डॉ. नवीन चंद्र जोशी के नेतृत्व में नौला फाउंडेशन के वैज्ञानिकों ने योजना पर काम करना शुरू कर दिया है।  हिमालयी राज्यों में साल दर साल तेजी से गहराते जलसंकट से निपटने के लिए अब वाटर हेरिटेज साइट्स बनाया जाएगा। इसमें स्थानीय ग्रामीणों की मदद से नौला धारों के संरक्षण संवर्धन में टीमें जलस्रोतों को चिह्नित करने, सूखे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने, जल की गुणवत्ता और भूमिगत जल से जुडे़ पहलुओं पर कार्य करेगी I  अल्मोड़ा के 308 गावों की जियोमैपिंग परियोजना के तहत कार्य शुरू हो गया हैं । इसके माध्यम से जलस्रोतों का डाटा तैयार किया जा रहा है। जबकि योजना के अगले चरणों में हिमालयी राज्यों के सभी जिलों की जियो मैपिंग कराई जाएगी। उत्तराखंड में जल मंदिरो यानि नौलो का इतिहास पांडवो से जोड़कर देखा जाता हैं जिनके वनवास व अज्ञातवास के समय बिताये गए क्षेत्रों में पीने के लिए जल स्रोतों के पानी को एकत्र करके यदि जल की मात्रा अर्थात उसका प्रवाह नियमित और ठीक-ठाक मात्रा में होता था तो जल को सूर्य के ताप से बचाने के लिए उन्हें  ग्राम-समाज उसे धारे-पंदेरे या मगरे का रूप देता था और यदि पानी की मात्रा कम होती थी तो सूर्य की किरणों से बचाकर उसे नौले का रूप दिया जाता था । इस अभ्यास से पानी के वाष्पीकरण को रोकने में मदद मिली। नौला और धारा के अलावा, पहाड़ों की ढलानों पर निर्मित छोटे-छोटे कृत्रिम तालाब और खल भी कई स्थानों पर नियमित रूप से बनाए जाते थे। ये तालाब न केवल वर्षा जल संचयन के पारंपरिक तरीके थे, जो भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद करते थे, बल्कि जंगलों में घरेलू और जंगली जानवरों को पानी भी प्रदान करते थे।  जहाँ तक धारों-नौलों के इतिहास की बात है, पनत्युरा सुरनकोट व गंगोलीहाट का नौला उत्तराखण्ड का सबसे प्राचीन नौला माना जाता है। आज जलवायु परिवर्तन व वनो का त्यधिक दोहन का दुष्प्रभाव पहाड़ों की जैव विविधता पर पड़ने सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र में धारे, पंदेरे, मगरे और नौले सूख रहे हैं और इसके लिये केवल और केवल मानव हस्तक्षेप उत्तरदाई है । फाउंडेशन सुदूर रिमोट गांव के क्षेत्रीय लोगो का विकास एवं उनकी सहभागिता से  जल  सरंक्षण के साथ साथ जैव विधतता को भी को बढ़ावा देने का हर संभव प्रयास कर रहा हैं जिसके लिए फाउंडेशन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समरसता एवं चिंतन संवाद के जरिये गगास घाटी के लोगो के जीवन पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव पर एक व्यापक नीति पर कार्य कर रहा हैं जिसका परिणाम जल्द ही सामने आने लगेगा । नौला फाउंडेशन का एकमात्र उद्देश्य सामुदायिक सहभागिता से परम्परागत जल सरंक्षण पद्धति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर पारम्परिक जल स्रोत नौले - धारे को उनका सम्मान वापस दिलाना हैं उनकी पहचान वापस दिलाना हैं और गांव वालो शुद्ध मिनरल पेयजल मुहैया करना हैं ।

संदीप कत्यूरी मनराल ने बताया नौला फाउंडेशन ने सामुदायिक सहभागिता से गगास घाटी के सुन्दर गांव थामण में एक पूरी तरह से सुख चुके नौले को पारम्परिक जल सरंक्षण पद्धति को अपनाकर पुनर्जीवित करने में सफलता पायी हैं और पानी भी शुद्ध हैं क्योकि मानवीय हस्तक्षेप नहीं के बराबर हैं और फाउंडेशन की असली चुनौती अल्मोड़ा शहर के पूरी तरह से प्रदूषित हो चुके भूजल व नौले धारों के पानी को शुद्ध करने के लिए तैयार होना पड़ेगा तभी असली परीक्षा होगी क्योकि प्रशासन तो इनके पानी को असुद्ध करने में असमर्थ हैं । 

समाजसेवी  गणेश कठायत ने बताया भूमिगत जल का निरन्तर ह्रास हो रहा है। जहाँ तालाब, पोखर, सिमार, गजार थे वहाँ कंक्रीट की अट्टालिकाएं खडी़ हो गईं। सीमेंट व डामर की सड़कें बन गईं। जंगल उजड़ गए। वर्षा जल को अवशोषित कर धरती के गर्भ में ले जाने वाली जमीन दिन पर दिन कम होने लगी है। समय के साथ जल की प्रति व्यक्ति खपत बढ़ती जा रही है। इसके लिए हम सबको मिलकर अपने पारम्परिक जल स्रोतों को पुनर्जीवन करके साफ़ व् स्वस्छ  जल उपलब्ध करना हैं और हर गांव को आदर्श गांव की श्रेणी में लाना हैं जहा सामाजिक समानता के साथ स्वस्छता का भी ध्यान रखा जाय I  जरुरत हैं आज उत्तराखंड के सभी युवाओं को आगे बढ़कर ग्रामीण स्वरोजगार की तरफ एक कदम बढ़ाना तभी हम पलायन पर रोक लगा सकते हैं तभी पहाड़ पानी व् परम्परा की रक्षा होगीI कार्यक्रम का संचालन बिशन सिंह रौतेला (पूर्व ग्राम प्रधान), भट्ट जी व ग्राम प्रधान दीपा रौतेला ने किया I 

समाजसेवी ललित बिष्ट ने बताया कालांतर में सरकारी योजनाओं के माध्यम से भूमिगत जल का दोहन कर, जल स्रोतों को बाधित कर या नदियों के प्रवाह को बांधों से रोक कर बड़ी बड़ी टंकियों में एकत्र कर घर घर तक पहुँचाने का काम शुरू हुआ। जरूरत के मुताबिक पानी जब घर पर ही उपलब्ध होने लगा तो नौलों की उपेक्षा होने लगी और हमारे पुरखों की धरोहर क्षीण-शीर्ण होकर विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई ।  नौले धारे सिर्फ जल स्रोत के माध्यम ही नहीं अपितु, हमारे जीवन मूल्यों को पोषित करती संस्कृति हैं  यदि हम समय से न जागे तो वो ही खत्म हो जाएगी,भूमिगत जल का निरन्तर ह्रास हो रहा है। नौला फाउंडेशन सुदूर रिमोट गांव के क्षेत्रीय लोगो का विकास एवं उनकी सहभागिता से  जल  सरंक्षण के साथ साथ जैव विधतता को भी को बढ़ावा देने का हर संभव प्रयास कर रहा हैं जिसके लिए फाउंडेशन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समरसता एवं चिंतन संवाद के जरिये गगास घाटी के लोगो के जीवन पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव पर एक व्यापक नीति पर कार्य कर रहा हैं जिसका परिणाम जल्द ही सामने आने लगेगा । नौला फाउंडेशन ने सामुदायिक सहभागिता से गगास घाटी के सुन्दर गांव थामण में एक पूरी तरह से सुख चुके नौले को पारम्परिक जल सरंक्षण पद्धति को अपनाकर पुनर्जीवित करने में सफलता पायी हैं और पानी भी शुद्ध हैं क्योकि मानवीय हस्तक्षेप नहीं के बराबर हैं और फाउंडेशन की असली चुनौती अल्मोड़ा शहर के पूरी तरह से प्रदूषित हो चुके भूजल व नौले धारों के पानी को शुद्ध करने के लिए तैयार होना पड़ेगा तभी असली परीक्षा होगी क्योकि प्रशासन तो इनके पानी को असुद्ध करने में असमर्थ हैं  ।

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