Tuesday, July 30, 2019

पहाड़-पानी-परंपरा: भारत की अनोखी जल संचयन सभ्यता को अपनाकर ही हम पर्यावरण संरक्षण कर पाएंगे:खेम सिंह कठायत


नई दिल्ली(abtaknews.com)30जुलाई,2019: पश्चिमी हिमालय में भारत का उत्तराखंड राज्य पानी से भरपूर माना जाता है क्योंकि उत्तराखंड में 17 नदियाँ, 31 झीलें और कई ग्लेशियर हैं।  गंगा का बेसिन भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है, जो देश के लगभग एक चौथाई हिस्से को बहाती है। उत्तराखंड में पानी के मुख्य स्रोत धारे, ग्लेशियर, नदियाँ, झीलें, जलधाराएँ (सभी आकार के), वर्षाजल और झरने हैं। भारतीय उपमहाद्वीप पठार की नदियाँ मुख्य रूप से वर्षा द्वारा पोषित होती हैं। गर्मियों के दौरान, उनका प्रवाह बहुत कम हो जाता है, और कुछ सहायक नदियाँ भी सूख जाती हैं, केवल मानसून में पुनर्जीवित होने के लिए। उत्तराखंड मॉनसून बेल्ट में निहित है और इस क्षेत्र में समुदायों ने वर्ष भर विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के लिए बारिश के पानी को इकट्ठा करना, उसका संग्रह करना और उसका उपयोग करना सीखा। इस प्रकार, इस क्षेत्र में एक अनोखी जल संचयन सभ्यता ने आकार लिया। प्राचीन काल में हालांकि राज्य अपने नागरिक को पानी उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार नहीं था; इसके लोगों द्वारा पानी के विभिन्न उपयोगों में कोई हस्तक्षेप नहीं था। लोगों की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई और पीने के लिए पानी का सामुदायिक प्रबंधन था, जिसने पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को जन्म दिया। स्थानीय समुदायों के पास स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर स्वामित्व का अधिकार था और राज्य ने इस अधिकार को मान्यता दी थी। जल स्रोतों को हमेशा पवित्र स्थलों के रूप में माना जाता था। चूंकि, जल निकायों को पवित्र माना जाता था, उन्हें अच्छी तरह से बनाए रखा गया था। परंपरागत रूप से उत्तराखंड में, जल संचयन की मुख्य प्रणालियाँ नौला, धरा, गुल, खल, सिमर, झीलें, कुंड या गजर और घाट (जल मिलें) हैं। भौगोलिक कठिन इलाकों के कारण दूरदर्शिता के साथ एक राज्य होने के नाते इनमें से कई प्रौद्योगिकियां अभी भी उपयोग में हैं और उत्तराखंड में लोगों की पानी की आवश्यकताओं का एक महत्वपूर्ण अनुपात प्रदान करती हैं। पुरातात्विक साक्ष्य से पता चलता है कि प्राचीन भारत के विज्ञान में जल संरक्षण के उनके अभ्यास गहरे हैं। नौले-धारे सिर्फ पारम्परिक जल स्रोत ही नहीं हैं बल्कि एक पूरी सभ्यता को समेटे हुए हैं, आज भी पहाड़ को कोई भी सांस्कृतिक, वैवाहिक, धार्मिक एवं परंपरागत कार्य बगैर नौले-धारे की पूजा के संपन्न नहीं होता हैं, उत्तराखंड में नौला यानि जल मंदिर सबसे महत्वपूर्ण, अदभुत  जल भंडारण व्यवस्था है   संरचनात्मक रूप से नौला में मंदिर की तरह सभी 4 तरफ छत ढलान है, और घर की तरह दो तरफ नहीं। उनके भीतर इन पहाड़ों का महान खजाना 'पानी' रहता हैं   यह एक पवित्र स्थल माना जाता था क्योंकि छत के ऊपर एक गोल पत्थर हमेशा रखा जाता है, जिसे भगवान विष्णु की मूर्ति माना जाता है। ज्यादातर कुमाऊं के कम हिमालयी क्षेत्र में पहाड़ी ढलानों पर पाए जाने वाले नौला अपने स्थापत्य वैभव के लिए अधिक प्रसिद्ध है। नौले का एक सामान्य डिज़ाइन एक टैंक की तरह होता है जो तीन तरफ से बंद होता है और ढंका होता है। चौथा पक्ष, जो खुला है, उसमें सीढ़ीदार तह तक ले जाते हैं। उत्कीर्णन के साथ उनके चारों ओर एक स्तंभित बरामदा है। जानवरों को नौला के छोटे प्रवेश द्वार से प्रवेश करने की अनुमति नहीं है और सिस्टम को इतना डिज़ाइन किया गया है कि उपयोगकर्ता स्रोत को दूषित नहीं करते हैं। सभी पानी को पवित्र माना जाता है, यहां तक ​​कि स्वच्छता के बुनियादी नियम का पालन किया जाता हैं।  नौला की संरचना और डिजाइन हिमालय के परंपरागत स्थानीय लोगों के महान प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान का प्रमाण है। उदाहरण के लिए, नौला के इंटीरियर को हमेशा स्तरित चरणों की श्रृंखला की तरह डिजाइन किया गया था, जो संकीर्ण और गहरा करने के लिए बनाए गए थे जो वाष्पीकरण के कारण पानी के नुकसान को कम करने में मदद करते थे। इन संरचनाओं में अभी भी कुछ अनसुलझे रहस्य छिपे हुए हैं, उदाहरण के लिए कदमों की संख्या हमेशा विषम में बनाई गई थी, जिसका कारण अभी भी अज्ञात है। उत्तराखंड के कुछ सबसे पुराने सुचारु उपयोगी नौला, सूर्यकोट (अल्मोड़ा) के 1,000 साल पुराने नौला, गंगोलीहाट (पिथौरागढ़) में 700 साल पुराने हाट कालिका मंदिर नौला, चमोली जिले के बद्रीनाथजी-का-नौला में हैं, जो वापस मिलते हैं। 7 ईसा पूर्व आदि कुछ महत्वपूर्ण हैं। इन नौलों में से एक महत्वपूर्ण गुण यह था कि यह गर्मियों में ठंडा पानी और सर्दियों में गर्म पानी उपलब्ध कराता था क्योंकि नौला को भूमिगत जल क्षेत्रों से पानी एकत्र करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। इन स्प्रिंग्स का प्रवाह बहुत संवेदनशील है और भूकंपीय गतिविधि और मानव गड़बड़ी से परेशान हो सकता है। उत्तराखंड के कई हिस्सों में नौला या धारा भूकंप के तेज झटकों के कारण सूख गया है। अफसोस की बात है कि ये पारंपरिक जल मंदिर को अब स्थानीय भूलने लगे हैं क्योंकि लोग तेजी से पाइप जलापूर्ति की सुविधा की ओर रुख कर रहे हैं। शहरीकरण, इसकी संकेंद्रित निर्माण और क्षणिक आबादी के साथ, प्राकृतिक संसाधनों से उपनिवेशवादी अलगाव के रूप में नौला के नुकसान में एक भूमिका है। नौला भवन के शिल्प को जारी रखने के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि लोगों और समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए और संरक्षण प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए और नौला फाउंडेशन द्वारा शुरू एक पहल 'पहाड़-पानी-परंपरा' सजगता से सभ्यता की ओर एक अनूठा प्रयास हैं  I  हिमालयी राज्य देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में द्रोणागिरी पर्वत से निकलने वाली सदानीरा गगास नदी के उत्तरी तट पर बग्वाली पोखर में छोटा सा गांव थामण एक सुन्दर सी पहाड़ी पर स्थित हैं जो अब नौला फाउंडेशन की अगुवाई में अब भारत का एक आदर्श गांव बनने की राह में अग्रसर हैं। यहां से सूर्योदय एवं सूर्यास्त का दुर्लभ प्राकृतिक दृश्य देखते ही बनता हैं। थामण एक मध्यम आकार का गांव है, जिसमें कुल 90 परिवार रहते हैं। जनगणना वर्ष 2011 के मुताबिक गांव में कुल 258 की आबादी है जिनमें से 106 पुरुष हैं जबकि 152 महिलाएं हैं 0-6 वर्ष की उम्र के बच्चों की इस गांव की जनसंख्या 56 है थामण  गांव की पूर्वी सीमा -कनलगांव; दक्षिण सीमा, गगास नदी; पश्चिम सीमा -गगास नदी और रावलसेरा; उत्तरी सीमा - सिरौता गांव और बनाली नदी स्थित हैं। थामण  गांव में पानी के 10-12 प्राकृतिक स्रोत नौला हैं पर पानी केवल 1-2 नौलों में हैं। गांव को सरकार से कुछ जगह पर स्वजल योजना से पीने का पानी और सिंचाई के लिए निचले इलाके में गगास नदी के नहर के पानी से पानी मिलता है परन्तु गर्मियों के दौरान गांव में भारी पानी की कमी का सामना करना पड़ता हैं और फिर पूरा गांव गगास नदी पर निर्भर करता है जो गांव से 1.5 किमी दूर है। इरासेरा थामन के पास केवल एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय और एक पंचायत भवन है। आसपास के बाजार और उप तहसील बग्वाली पोखर थामन से लगभग 2 किमी दूर है, वे 3 इंटरमीडिएट स्कूल और 3 प्राथमिक विद्यालय, एक पुलिस चौकी, एक उप तहसील कार्यालय, एक आरएफसी वेयरहाउस, बग्वाली पोखर में स्थापित बड़े मूल वस्तु बाजार है।  थामण को एक आदर्श गांव बनाने में नयी सोच नयी दिशा और जय माँ काली महिला मंगल दल की सदस्यों को एकजुट करकें विभिन्न जन जागरूकता कार्यक्रम की योजना बनाई। गांव में नौला और जल स्रोतों के बावजूद गर्मी के दौरान गांव में गंभीर पानी की कमी है, अब ज्यादातर सूख गए हैं; वहां एक जल योजनाएं (स्वजल) रही  हैं जिसमें ज्यादातर समय गांव में पानी की आपूर्ति नहीं की जाती है। ऐसी पानी की किल्लत से परेशान होकर इस गांव के ज्यादातर लोग अपनी आजीविका के लिए शहर पलायन कर गए हैं गगास नदी के किनारे पहाड़ी इलाके में स्थित होने के बावजूद इस गांव में गर्मियों में पानी की भारी कमी होती हैं। अतीत में यह क्षेत्र प्राकृतिक नौले, धारे, गधेरे आदि जल संसाधनों से भरा है लेकिन अब वे सूख गए हैं, पूरे क्षेत्र में चीड़ के जंगल और कंक्रीट के घर बन गए हैं अब नौला फाउंडेशन ने स्थानीय ग्रामीणों की मदद से जल संरक्षण के प्रयासों के अलावा पानी के स्रोतों को रिचार्ज करने के महत्व को समझने के लिए अपने ग्रामीण क्षेत्रीय सहभागिता के सफल प्रयोग के साथ इस गांव की प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्य को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने के लिए कदम उठाए हैं। तो यहां हमारे पास उन्हें जीवित बनाने और पीने, खेती, मवेशी उपयोग आदि के लिए अपने पानी का उपयोग करने की आशा की थोड़ी किरणें हैं। ये उपाय कठिन हैं पर दीर्घकालीन होगा और थामण गांव को एक आदर्श गांव बनाने में मददगार साबित होगा। स्थानीय ग्रामीणों और नौला मित्रों स्वयंसेवकों की मदद से नौला फाउंडेशन ने विशेष प्रकार के चाल खाल के साथ साथ, कॉन्टूर ट्रेंच, पारिस्थितिक जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भारी विशेष जल छिद्रण बागान को फिर से बनाया , छोटे पिट बैंड, चाव /कॉन्टूर ट्रेंच और विशेष प्रजाति के पौंधों का पौधारोपण करके कुछ ही समय में जल संकट से छुटकारा पा सकते हैं।
पानी संरक्षण के लिए पेड़ महत्वपूर्ण हैं। कुछ पेड़ हैं जो दूसरों को पानी से अधिक आकर्षित करते हैं। पानी के पेड़ वाले पेड़ हिमालयी ओक (सफेद, हरे और भूरे रंग) और देवदार हैं, इन पेड़ों के काटने और पाइंस की जगह पानी के स्तर के कठोर क्षय स्रोत का मुख्य स्रोत हैं, नौला सूखने लगते हैं। याद रखने की मुख्य बात यह है कि कोई सीमेंट या अन्य मोर्टार का उपयोग नहीं किया जाता है ताकि पानी नौला में घूमता रहे। इसी आशा से नौला फाउंडेशन ने उत्तराखण्ड का प्रसिद्ध त्यौहारहरेलाके अवसर पर  हरेला वृक्षारोपण दिवस  मनाया और थामन गांव के जलागम क्षेत्र में जन भागीदारी से करीब 700 नए वृक्षों का रोपण किया।
नौला फाउंडेशन ने पूरे उत्तराखंड में मध्य हिमालयी क्षेत्र विशेष (विशेषकर प्रथम चरण में गगास नदी घाटी क्षेत्र) में प्राकृतिक एवं भूजल, हिमालयी क्षेत्र की नदियों एवं गधेरो का संरक्षण, हिमालयी जैव विविधता का संरक्षण, जंगल, ज़मीन का वैज्ञानिक विधि से सरंक्षण, संवर्धन एवं शोध (रिसर्च) पर कार्य शुरू कर दिया हैं नौला फाउंडेशन प्रतिबद्धता के साथ क्षेत्र के निवासियों के सहयोग और भागीदारी से मृतप्राय पेयजल स्रोतों के पुनर्निर्माण,संरक्षण, संवर्द्धन और निरंतर विकास के लिए  संस्था समर्पित भाव से काम करने का संकल्प लेती है उत्तराखंड में विशेषतः पर्वतीय जनपदों में पेयजल के स्रोत नौलों, धारों (झरनों) और गधेरों आदि के रूप में हैं।
नौलों, चालों, खालों लुप्तप्राय जल  स्रोतों को पुनर्जीवित करने के पश्चात उनकी उचित देखभाल, संरक्षण, प्रबंधन से पुनः निष्क्रिय होने से बचाने की प्रतिबद्धता के साथ फाउंडेशन आगे बढ़ना चाहता है। वर्षा जल का भण्डारण संचयन होने के कारण स्थानीय जल स्रोतों के रिचार्ज की व्यवस्था समाप्त हो गई है। सड़कों और भवनों में सीमेंट, कंक्रीट आदि का अत्यधिक इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे कच्ची जमीन (जो वर्षा जल को सोखकर स्रोतों को रिचार्ज कर सकती है) की उपलब्धता निरंतर कम होती जा रही है अतः वर्षा जल का संचयन और भण्डारण आवश्यक है। आम जनता में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा कर उनकी क्षमता का विकास करना, रखरखाव संचालन करना, निरंतर विचार गोष्ठियों और प्रशिक्षण की व्यवस्था करना फाउंडेशन का उद्देश्य है वृक्षारोपण वनीकरण से स्थानीय जनता की चारा, लकड़ी, ईंधन की आवश्यकता की पूर्ति के साथ साथ भूमि कटाव को रोकने और भूमि की नमी को बनाए रखने में मदद मिलेगी जिससे असिंचित भूमि की वर्षा पर निर्भरता कम हो जाएगी मृदा का परीक्षण करवा कर क्षेत्र के लिए उपयुक्त प्रजाति के वृक्षों के रोपण की व्यवस्था फाउंडेशन करवाने के लिए प्रयासरत है प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए नौला फाउंडेशन गगास नदी एवं सहायक गधेरो के जलागम क्षेत्रमें गहन वृक्षारोपण एवं विशेष प्राचीन तरीके से चाल खाल बनायेगा, उस जल स्रोत को पुनर्जीवित होने मे एक दो साल तो जरूर लगेंगे पर वह दीर्घकालिक होगा   इस तरह का प्रयोग पर्यावरण के सन्तुलन मे भागीदार होगा और क्षेत्र की पेय जल की समस्या भी दूर हो पायेगी सामाजिक हितो से सरोकार रखते हुए गगास नदी घाटी क्षेत्र के तेज़ी से घटते जलस्तर और परिणामकी चर्चा हेतु एक  चिंतन गोष्ठी  के साथ साथ सामाजिक समरसता कार्यक्रम के तहत नौला फाउंडेशन का निरीक्षण दल रावलसेरा के लहलहाते धान के खेतों से होते हुए गगास और बैनालीगाड़ को पार कर थामण गांव पहुँचे। जय माँ काली महिला मंगल दल तथा समस्त ग्राम वासियों ने टीम का पंचायत भवन में गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ स्वागत किया और पूरे गांव के नौलों (नौगाड़, नौगैर, दुबरा इत्यादि), ऐड़ी देवता मंदिर, भूमिया धार, भैरव मंदिर का भ्रमण किया और नौला मित्रों द्वारा किए गए शानदार वृक्षारोपण और सीसीटी कार्यों का निरीक्षण किया। निरीक्षण में पाया गया कि रोपित किए गए वृक्षों में से लगभग 90 वृक्ष स्वस्थ हैं और उनकी ठीक गति से वृद्धि हो रही है। चाल खाल का निर्माण कार्य दक्षता के साथ किया गया है। कुल मिलाकर अभी तक किया गया कार्य संतोषप्रद और सराहना योग्य  है थामण ग्राम की महिला मंगल दल ने निरीक्षण टीम को अभी तक किये गये कार्यों और कठिनाइयों की विस्तृत जानकारी दी और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की। भूजल के स्तर में लगातार रही  कमी पर चर्चा के दौरान इसके कारणों पर भी विस्तार से प्रकाश डालते हुए स्थानीय ग्रामीणों ने अपने अनुभवों को साझा किया।
भूजल के लगातार दोहन, सूखते जलस्रोत तथा जल संरक्षण,भण्डारण और संवर्धन के प्रति जागरूकता की कमी एवं उदासीनता के कारण उत्पन्न भयावह स्थिति के प्रति सजग रहने की आवश्यकता पर सभी वक्ताओं और उपस्थित महानुभावों ने बल दिया और पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।
गगास बचाओ अभियान के तहत रौगाड़ गधेरे को पुनर्जीवित करने की दिशा में पहले ही स्थानीय स्तर पर उठी आवाज को और अधिक मजबूती से आगे बढ़ाने के संकल्प को इस चर्चा से बल मिला है। इसके अलावा मनेला से बिन्ता तक गगास नदी को संवर्धित करने वाले सहायक नदी, नालों और गधेरो के स्राव में निरंतरता बनाए रखने और वृद्धि करने की दिशा में काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। एक पहल विकास की देवभूमि उत्तराखंड के गगास घाटी में बग्वाली पोखर, द्वाराहाट विधान सभा क्षेत्र में दिवाली के अवसर पर लगने वाले ऐतिहासिकबग्वाल कौतिक  मेले में नौला फाउंडेशन द्वारा क्षेत्र में किये जा रहेजल सरंक्षण, जैव विविधता, प्लास्टिक मुक्त हिमालयफाउंडेशन की कार्यशाला में नया जनचेतना अभियानकुरी घास ( लैंटाना ) मुक्त उत्तराखंडका संकल्प लिया।  थामन गांव वालो की पहल पर ये उत्तराखंड का पहला गांव होगा जो लैंटाना कुरी मुक्त होगा और उसकी जगह पर आर्गेनिक खेती को बढ़ावा दिया जायेगा और क्षेत्र में पलायन पर रोक लगाने के लिए नौला मित्रों द्वारा ग्राम थामन को पूरे विश्व पटल पर एक आधुनिक सुख सुविधाओं से भरपूर आर्गेनिक मॉडल विलेज के रूप में विकसित किया जायेगा उत्तराखंड में जैव विविधता को आक्रामक प्रजाति की कुरी घास की तीव्र वृद्धि के कारण खतरे का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि लैंटाना, कालाबासा और गाजर घास बहुत तेजी से फैलती है और घास या अन्य पौधे या झाड़ी समेत किसी और को उगने नही देती, जो उस क्षेत्र में उगता है जिससे प्रवासन या जड़ी-बूटियों की संख्या में गिरावट आती है। इससे खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर बाघ, तेंदुए और अन्य मांसाहारियों का भुखमरी हो सकती है। ग्रामीणों एवं महिला मंगल दल की उत्तराखंड से रिवर्स माइग्रेशन जैसी पहल पर कई प्रवासी अपने गांव थामन में वापस आने और जैविक खेती करना चाहते हैं और फाउंडेशन सुदूर रिमोट गांव के क्षेत्रीय लोगो का विकास एवं उनकी सहभागिता से  जल  सरंक्षण के साथ साथ जैव विधतता को भी को बढ़ावा देने का हर संभव प्रयास कर रहा हैं जिसके लिए नौला फाउंडेशन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समरसता एवं चिंतन संवाद के जरिये गगास घाटी के लोगो के जीवन पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव पर एक व्यापक नीति पर कार्य कर रहा हैं जिसका परिणाम जल्द ही सामने आने लगेगा
(खेम सिंह कठायत,समाजसेवी एवं संस्थापक सदस्य,नौला फाउंडेशन नयी सोच नयी दिशा)

No comments:

Post a Comment

Post Top Ad

Your Ad Spot

Pages