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Friday, June 14, 2019

पर्यावरण संरक्षण पर विशेष आलेख ; पहाड़-पानी-परंपरा : सजगता से सभ्यता

नई दिल्ली(abtaknews.com) 14जून,2019; वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखण्ड में प्राकृतिक जलस्रोतों का सूखना, भूकम्प भी एक कारण हो सकता है। आये दिन छोटे-मोटे भूकम्प के झटके इस पहाड़ी राज्य की अब नियति बन चुकी है। भूकम्प के झटकों से जलस्रोत कभी बन्द हो जाते हैं और कभी कई रास्तों के जुड़ जाने से पानी अधिक हो जाता है, या पानी का मूल रास्ता बदल जाता है। यही नहीं वैज्ञानिकों के एक सर्वेक्षण में यह भी पुष्टि हुई कि जलवायु परिवर्तन के असर से झरनों में पानी कम हो रहा है।
राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों की हालात देखें तो पेयजल को लेकर बड़ी ही डरावनी तस्वीर सामने आ रही है। मानक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति को एक दिन में ४० लीटर पानी मिलना चाहिए था, लेकिन ये वे गाँव हैं जहाँ प्रति व्यक्ति को २० लीटर प्रतिदिन नसीब नहीं होता। आँकड़े देखें तो सर्वाधिक पेयजल का संकट पौड़ी जिले में है। जहाँ ४७३२ गाँव पेयजल की किल्लत से जूझने के आदी हो गए हैं। यही हालात टिहरी जनपद के हैं वहाँ भी ३३८६ गाँव पानी की समस्या से त्रस्त हैं। वही अल्मोड़ा जिले के रानीखेत निटक गाव-चल्सिया पड़ोली का हाल है, गाव की कम आबादी होने के बाद भी पानी का आकाल बना हुआ है, गाव में लोग बूद बूद पानी को तरस रहे है। 
पहाड़ों से पलायन के कारण खेती समाप्त होना भी जलस्रोत सूखने का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। पेयजल निगम ने प्रदेश के सूखे जलस्रोतों का सर्वेक्षण कराया था, जहाँ पानी सूख गया था, वहाँ के जलस्रोतों का ट्रीटमेंट किया गया। इसके बाद भी वहाँ भूजल रिचार्ज नहीं हुआ। उत्तराखण्ड पेयजल निगम के एमडी भजन सिंह का कहना है कि चट्टानों की बनावट पता नहीं चलती। ट्रीटमेंट के बाद भी जलस्रोत रिचार्ज नहीं होते। उत्तराखण्ड जल संस्थान के महाप्रबन्धक एसके गुप्ता का कहना है कि खेती बन्द होने से जलस्रोत सूख जाते हैं। खेतों में पानी भरने से जलस्रोत रिचार्ज होते हैं। जिन स्थानों पर पलायन हुआ है और खेती नहीं होती, वहाँ जलस्रोत अधिक सूखे हैं। यही वजह है कि पौड़ी जनपद के सर्वाधिक जलस्रोत सूख चुके हैं। क्योंकि पौड़ी से राज्य में सर्वाधिक पलायन की खबरें आ रही हैं। खेती के लिये लोग च्वर्षाजल संचयनज् भी किया करते थे, जो अब नहीं हो पा रहा है। 

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