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Monday, June 3, 2019

आर्टेमिस हाॅस्पिटल ने न्यूरोसर्जरी में नवीनतम प्रगति के बारे में जानकारी देने के लिए इंटरैक्टिव सत्र आयोजित


भोपाल /फरीदाबाद(abtaknews.com)03जून,2019: न्यूरोसर्जरी और नाॅन-इनवेसिव रेडियोसर्जरी तकनीक के क्षेत्र में हाल में हुई प्रगति के कारण, अब विभिन्न प्रकार के ट्यूमर के इलाज आसान, विश्वसनीय और अत्यधिक सुरक्षित हो गए हैं। सबसे उन्नत तकनीकों में से एक, एम 6 साइबरनाइफ के इस्तेमाल से, अब यहां तक कि सबसे जटिल ट्यूमर के लिए भी सटीक इलाज संभव हो गया है। इसके मिनिमली इनवेसिव होने और आॅपरेषन में कम समय लगने के कारण भी रोगियों को अतिरिक्त लाभ मिलता है।आम लोगों और डॉक्टरों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए आज भोपाल में जागरूकता अभियान चलाया गया। इस कार्यक्रम का नेतृत्व आर्टेमिस हाॅस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. आदित्य गुप्ता के साथ-साथ न्यूरोसर्जरी विभाग के निदेशक डॉ. सुमित सिंह ने किया और प्रौद्योगिकी के महत्व और लाभों पर प्रकाश डाला।
आर्टेमिस हॉस्पिटल में एग्रीम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज के न्यूरोसर्जरी विभाग के निदेशक डाॅ. आदित्य गुप्ता ने कहा, ‘‘एम 6 साइबरनाइफ रेडियोसर्जरी सटीक, दर्द रहित और नाॅन-इनवेसिव रेडियेषन उपचार है। यह कैंसर वाले और कैंसर रहित वैसे ट्यूमर के इलाज के लिए बेहद प्रभावी है जिसकी सर्जरी नहीं की जा सकती है। इसके लिए एनेस्थीसिया देने और चीरा लगाने की आवश्यकता नहीं होती है और अभी तक इसके कोई जोखिम या दुष्प्रभाव की भी सूचना नहीं मिली है। दुनिया भर के रोगियों को सर्वोत्तम सुविधाएं प्रदान करने के दृष्टिकोण के साथ, अस्पताल सटीक और बेहतर उपचार के विकल्पों के लिए नवीनतम दवाओं और प्रौद्योगिकी को पेश करने में अग्रणी है। एम 6 साइबरनाइफ के इस्तेमाल के मामले में, निष्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि लोगों को इससे सबसे अधिक लाभ होगा और इस प्रयास से रोगियों को प्रगतिशील और संवेदनशील देखभाल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।’’ 
गामा नाइफ, टॉमोथेरेपी या पारंपरिक रेडियेश  थेरेपी जैसे अन्य पारंपरिक रेडियोसर्जरी की तुलना में, एम 6 साइबरनाइफ रोबोटिक सर्जरी ने स्क्रू और बोल्ट के साथ स्टीरियोटैक्टिक हेड फ्रेम की आवश्यकता को समाप्त कर दिया और जिससे सर्जन को माइक्रो-मिलीमीटर सटीकता के उच्च स्तर को प्राप्त करने में सक्षम बना दिया। यह सर्जरी नाॅन-इनवेसिव तरीके से की जाती है। यह ओपीडी आधारित प्रक्रिया है जिसमें मरीज बहुत कम समय में ठीक हो जाता है। 
गुड़गांव स्थित आर्टमिस हॉस्पिटल, न्यूरोलॉजी के निदेशक डॉक्टर सुमित सिंह का कहना है कि “न्यूरोसर्जरी में हाल की प्रगति के साथ, पार्किंसंस रोगों और अन्य संबंधित मूवमेंट डिसऑर्डर के लिए उपचारों के परिणामों में बेहतर बदलाव आए हैं। मूवमेंट डिसऑर्डर के इलाज में डीप ब्रेन स्टीम्यूलेशन एक सफल तरीका है। डीबीएस का उपयोग केवल तभी किया जाता है जब दवा असर करना बंद कर देती है।  डीबीएस का असर मरीज में लगातार 24 घंटों के लिए रहता है जिससे उसका जीवन पहले की तरह सामान्य हो सके।”
इस उपचार के तहत विकिरण की उच्च खुराक को सीधे ट्यूमर में बीम करने के लिए एक परिष्कृत छवि मार्गदर्शन प्रणाली का उपयोग किया जाता है जिससे रोगी को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं पड़ती है। यह दर्द रहित है और डे- केयर इलाज में कोई जोखिम नहीं है, जिसमें सत्र समाप्त होते ही रोगियों को छुट्टी दे दी जाती है।

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