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Thursday, May 2, 2019

पर्यावरण संरक्षण पर विशेष आलेख ; पहाड़.पानी.परंपरा सजगता से सभ्यता

नई दिल्ली(abtaknews.com दुष्यंत त्यागी) 02 मई,2019; जलवायु परिवर्तन के कारण 50 प्रतिशत से ज्यादा जल धाराएं सूख चुकी हैए और जो बची है उनमें भी सीमित जल ही बचा है अगर हम अभी भी नहीं सुधरें तो वो दिन दूर नहीं जब गंगा यमुना जैसी सतत वाहिनी नदिया को बनाने वाली जलधाराएं सूख जाएगी और तब स्थिति कितनी भयावह होगी ये आप कल्पना कर सकते हैं। स्वामी वीत तमसो ने बताया कि ख़तरे की घंटी बज चुकी है प् सुदूर रिमोट गांव के क्षेत्रीय लोगो का विकास एवं उनकी सहभागिता से पारम्परिक प्राकृतिक जल स्रोतों नौले धारे का सरंक्षण के साथ जैव विविधतता को भी बढ़ावा देना नौला फाउंडेशन का लक्ष्य हैं जिसके लिए फाउंडेशन क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक समरसता एवं चिंतन संवाद के जरिये गगास घाटी के लोगो के जीवन पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभाव पर एक व्यापक नीति पर कार्य कर रहा हैं जिसका परिणाम जल्द ही सामने आने लगेगा। जल की उपलब्धता व उपभोग की तस्वीर पूरे विश्व में बहुत तेजी से बदल रही है। स्वामी वीत तमसो का कहना हैं विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में साल २०३१ तक सिर्फ ४०ः लोगो को ही पीने का जल उपलब्ध हो पायेगा द्य पानी अन्तरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर चिन्ता का विषय बन गया है। एक तरफ वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह पर अपनी पहुंच बना ली हैंए तो दूसरी तरफ विश्व में पेय जल की उतनी ही समस्या बढ़ती जा रही है। तब प्रश्न उठता है कि इतने विकास के बावजूद क्या सरकार व समाज पानी का सुनिश्चित प्रबन्धन करने में क्यों असमर्थ रहाघ् इसका स्पष्ट कारण सरकार की नीतियाँ और समाज की विफलता है या और कोई प्राकृतिक कारण है।  
नौला फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिशन सिंह  के अनुसार इस विकास की अवधारणा के कारण जल की माँग में व पूर्ति में काफी अन्तर दिखाई दे रहा है । नौला फाउंडेशन का संकल्प है ए नीरए नदी और नौले का सम्मान वापस दिलाना जिसको बेहतर करने के लिए नौला फाउंडेशन अपनी छोटी सी कोशिश से आगे बढ़ रहा है ताकि हमारी आने वाली नस्लों को बेहतर जिन्दगी मिल सके प्अगर हिमालय को बचाना हैंए  अपने अस्तित्व को बचाना हैं तो हमें पानी को बचाना ही होगा द्य जलए जंगल एवं जमीन का विकास मानव के  बिना हो सकता हैं परन्तु मानव का विकास जलए जंगल एवं जमीन के बिना नहीं हो सकता यही अटल सत्य हैं। 
समाजसेवी संदीप मनराल ने बताया आज विभिन्न वैश्विक सस्थांयेए सरकारे व विभिन्न समाज सेवी सस्थांये अपने स्तर पर कार्यरत हैए परन्तु मानव सभ्यता पर आया यह सकंट बहुत बडा है और इससे लडने के लिये हम सब को अपने अपने स्तर पर कार्य करने की जरूरत है खैर अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ हैए किन्तु हमै शीघ्र ही इस दिशा मै कार्य करने होंगे प्  त्वरित उपाय जो कि हम कर सकते है यही है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाये और पेड़ों की कटाई को रोकने की कोशिश करे यह तो है कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाये और पेड़ों की कटाई को रोकने की कोशिश करे सिर्फ पर्यावरण का सन्तुलन बनाने का कार्य करेगा प् परंतु हमारे सामने एक और गंभीर समस्या है और वह है पेय जल की और इस समस्या को हम काफी कुछ दूर कर सकते है अपने पारम्परिक प्राकृतिक जल सृोतो को पुनर्जीवित करने के लिए हमै उसके आसपास उपरी क्षेत्र मै गहन वृक्षारोपण करना पड़ेगाण्  ऐसे पेड़ जो कि अपने आसपास के वातावरण को ठंडा रख कर बारिश को आकर्षित कर सके और फिर जिसकी जडै पानी को भी रोक सके प् इस तरह उस जल सृोत को पुनर्जीवित होने मै एक दो साल तो जरूर लगेंगे पर वह दीर्घकालिक होगा । इस तरह हम पर्यावरण के सन्तुलन मै भागीदार हौगे और अपनी पेय जल की समस्या को भी दूर कर पायेगें साथ ही साथ इससे मिट्टी और पहाड़ों का कटाव भी रुकेगाय वैसे तो हम सभी कही भी कभी भी पेड़ लगा सकते है और पर्यावरण संशोधन मैं अपना योगदान दे सकते है । हम जल संरक्षण और कटाई के महत्व के बारे में स्थानीय लोगों में जागरूकता फैलाएंगे। 
 गगन प्रकाश सिंह ने बताया आधुनिकता की दौर में बड़े बड़े डैम बनाकर क्षेत्र की जैव विविधता को ख़त्म करने के साथ ही भविष्य में बहुत बड़े विनाश की ओर धकेल रहे हैंय हमारे बुद्धिजीवी वैज्ञानिक पर्यीवरणविद भूगर्भशास्त्री हमें सालो से चेता रहे है पर हम लापरवाह बने रहेए वे लोग अपने स्तर पर जितना कर सकते है कर रहे हैए पर यह काफी नही है। 
जब हमारे पारम्परिक जलस्रोत नौले.धारे और गधेरे सुरक्षित रह पाएंगे तभी गंगा यमुना सतत वाहिनी नदियों में पानी होगा प् इसी नौला धारा जल संकल्प के साथ नौला धारा संस्कृति को लेकर क्षेत्रीय जन भागीदारी के परस्पर सहयोग से नौला फाउंडेशन सामाजिक संस्था पुरे मध्य हिमालयी क्षेत्र उत्तराखंड में प्रतिबद्धता के साथ स्थानीय निवासियों के सहयोग और भागीदारी से मृतप्राय पेयजल स्रोतों के संरक्षणए संवर्द्धन और निरंतर विकास के लिए तेजी से धरातल पर कार्य शुरू कर दिया हैं। 
 मशहूर चिंतक जीव विज्ञानी डॉण् नवीन चंद्र जोशी की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय की गोद में स्थित देवभूमि का बड़ा भाग वनों एवं अन्य प्राकृतिक संपदाओं से घिरा हुआ है। जनसँख्या में लगातार इजाफा और अवैज्ञानिक ढंग से विकास की सोच ने  वन संपदा को नष्ट करने में बड़ी भूमिका निभाई है। अवैध खननए तीव्रता से हो रहे औद्योगिकीकरणए वनों में आगजनी की घटनाओं व अवैध कटान से प्रदेश का पर्यावरण कई तरह के संकटों से घिर चुका है। जंगलों की कटाई या वन संपदा को लेकर बदइंतजामी  से भू.संरक्षणए जल क्षेत्रों की रक्षाए खाद्यशृंखला आदि पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। किया प् प्रकृति की अपनी एक पारिस्थितिकी पहचान है। आज पूरे दुनिया जलवायु परिवर्तन की वजह सूखते प्राकृतिक जल स्रोतए प्रदूषणए और सूखे जैसे बीमारियों से जूझ रही है द्य नौला फाउंडेशन द्वारा नदीए वनए पहाड़ए पलायन तथा झील सभी की अपनी एक स्वतंत्र पहचान वापस दिलाने की मुहीम को आगे बढाते हुए  हर दिशा में काम कर रही है। 
सदियों पुरानी पेयजल की यह व्यवस्था हिमालयी गांवों में नौला व धारे के नाम से जानी जाती है। ये नौले और धारे यहां के निवासियों के पीने के पानी की आपूर्ति किया करते थे। इस व्यवस्था को अंग्रेजों ने भी नहीं छेड़ा था। यह व्यवस्था केवल तकनीक पर आधारित नहीं थी बल्कि पूरी तरह से यहां की संस्कृति को अपना आधार बनाकर किया जाने वाला काम था। कई अवसरों पर नौलों का महत्वपूर्ण स्थान देखा जाता है। उत्तराखण्ड के पर्यावरण.पारिस्थितिकी से समाज का हिमालयी क्षेत्र सदियों से पानीए पहाड़ोंए नदियोंए जलवायुए जैवविविधता एवं वृहत्त सांस्कृतिक विविधता का मूल रहा है। लेकिन गंगा.यमुना नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखण्डए जो समस्त उत्तर भारत को सिंचता हैए आज खुद प्यासा है। यहाँ पानी का मुख्य माध्यम प्राकृतिक जल स्रोत है। जो वनाच्छादन की कमीए वर्षा का अनियमित वितरण एवं अनियंत्रित विकास प्रक्रिया के कारण सूखते जा रहे हैं।
समाजसेवी निशांत त्यागी जी का कहना है कि वनों का क्षेत्रफल घटना हम सबके लिए एक गंभीर चिंता का विषय है । खाद्य श्रंखला में परस्पर समानता बनायीं जानी चाहिएए जैव विविधता को बचाने के साथ साथ क्षेत्रीय निवासियों के सतत विकास लक्ष्य पर ध्यान देना होगा और लैंटानाए गाजर घास एवं कला बांसा जैसे प्रवासी विषैले पौधों को हटाकर पारम्परिक निवासी पौधे एवं जड़ी बूटियों लगाने की ओर सभी देशवासियो को कदम बढ़ाना होगा। 
आज धरती का तापमान बढ़ने से जलवायु परिवर्तन की जो स्थितियाँ बनी हैं उनके कारण उत्तराखण्ड जैसे क्षेत्र में नौले. धारे सूख रहे हैं या सुख चुके हैं और इसके लिये हम सब  जिम्मेदार हैं । आदिकाल से लेकर आज के अत्याधुनिक युग तक को देखें तो सहज ही मालूम हो जाएगा कि मनुष्य के अलावा धरती पर कोई भी जीव.जन्तु नहीं है जिसने अपनी जीवन.पद्धति में कोई आमूल परिवर्तन किया हो। जिन जीव.जन्तुओं ने अपनी जीवन.पद्धति में थोड़ा.बहुत परिवर्तन किया भी हैए उसके लिये भी मानव ही दोषी है। पानी की उपलब्धता कम होने के कारण स्वास्थ्य भी संकट में है और इन समस्याओं के बढ़ने से आर्थिकए सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी सामने आ रहे हैं। समाज में हिंसा बढ़ रही हैए मानवीय रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं और संक्षेप में समाज बिखर रहा है।

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