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Monday, March 18, 2019

नौले धारे बचेंगे तो संस्कृति बचेगी ,पवित्र आमलकि एकादशी पर विशेष


नई दिल्ली (abtaknews.com दुष्यंत त्यागी) 18 मार्च,2019; पवित्र आमलकि एकादशी के पर्व में ग्रामीण अचंलो में श्रद्धालुओं ने नौला धारा पूजन दिवस पूरे कुमाऊँ अंचल में बड़े जोर शोर और उल्लास के साथ मनाया गया । स्वामी वीत तमसो के अनुसार जीवन के नियम मैं जो भी कर रहा हूं, तत्क्षण, उसी क्षण, उसके साथ ही लगा हुआ फल है, अगले जन्म तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।नौला इंडिया सेव वाटर सिविल सोसायटी की पहल पर श्री हरि विष्णु समर्पित 'आमलकी एकादशी' दिनांक 17 मार्च  2019 मनाया गया।आंवले को भगवान श्रीहरिविष्णु ने आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया है। नौले पर अंकित भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, और जल लेकर नौलों का सम्मान के प्रति तथा नौलों के संरक्षण में यथासम्भव सहयोग के प्रति संकल्प लिया गया। पर्यावरणविद किशन भट्ट ने बताया नौले धारे उतराखडं की एतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक परंपरा का बिरासत है और आज आधुनिकता की दौड़ मैं हम सब ये भुलते जा रहे है, नौला पूजन उत्तराखंड की संस्कृति परंपरा का एक लौकिक अनुष्ठान है। बग़ैर नौला पुजन के हम विवाह संस्कार संपन्न हो जाने के बाद जब नवविवाहित वधू अपने ससुराल पहुंचती है तो वह उस दिन या दूसरे दिन प्रातः अपने ससुराल के गांव की कन्याओं और कुछ सौभाग्यवती महिलाओं के साथ अपने गांव में के जलाशय नौले धारे के पास जाकर रोली अक्षत पुष्प से उनका पूजन करती है और इसके उपरांत घर लौटते समय एक जल पात्र में वहां से पानी भरकर उसे अपने सिर पर रख कर घर लाती है और उसे सभी बड़ों को वह इष्ट मित्रों को पिलाती है और उनसे चीर सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त करती है इस अनुष्ठान का उत्तराखंड के सभी अंचलों में अनुपालन किया जाता है।
पर्यावरणविद श्री संदीप मनराल ने बताया उत्तराखंड की एतिहासिक विरासत नौले आज नौले सिर्फ इतिहास बनकर रह गए हैं कई नौले तो विलुप्त हो चुके हैं कुछ नौले सूख चुके हैं, और जो नौले  जीवित हैं वह ग्रामीण वासियों की प्यास को बुझा रहे हैं। नौला फाउंडेशन ने समस्त प्रदेशवासियों की मदद से पूरे नौला धाराओं का खोया हुआ सम्मान वापस दिलाने में कार्य कर रही है। 
पुरोहित मोहन चंद्र, रवींद्र कर्नाटक जी ने बताया भारतीय संस्कृति मैं तथा हमारे वेद पुराणों में नौलो को भगवान विष्णु का स्वरूप समझा जाता है।दोनों के पास बनी मंदिर और उनके अंदर के पत्थर पर भगवान विष्णु की आकृति इस बात को प्रमाणित करती है इनकी पवित्रता को अक्षुण्य रखने के लिए जल देवता के रूप में शेष शाही विष्णु नारायण की प्रतिमाओं को तो प्रमुखता से स्थान दिया गया है । प्रदेश भर के विभिन्न - विभिन्न गाँवों, जिलो, क्षेत्रों में नौले - धारे के चारो ओर साफ़ सफाई और नौले धारा का पूजन किया गया, बड़े संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों ने जुड़कर नौले धाराओं को बचाने का और उनकी पूजा करने का संकल्प लिया । अध्यक्ष बिशन सिंह ने बताया जल, जगंल और ज़मीन का विकास मानव के बिना हो सकता है परन्तु मानव का विकास जल, जंगल और ज़मीन के बिना नहीं हो सकता ये समझना होगा और हम सबको आगे आना होगा क्योंकि अगर जल जंगल ही नहीं रहेंगे तो मानव सभ्यता कैसै बचेगी | अगर हिमालय को बचाना हैं, अपने अस्तित्व को बचाना हैं तो हमें पानी को बचाना ही होगा | 

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