Thursday, January 24, 2019

अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट ने बल्लबगढ़ में मनाया नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्मदिन



बल्लभगढ़ (abtaknews.com)भारत के स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस का मनाया जन्मदिवस तथा ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष राज कुमार शर्मा ने 23 जनवरी की अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी दी उन्होंने बताया कि 23 जनवरी को.. राष्ट्रीय अध्यक्ष राज कुमार शर्मा ने बताया कि सुभाष चन्द्र बोस का जन्म: 23 जनवरी 1897 तथा  मृत्यु: 18 अगस्त 1945 को हुई थी वे नेता जी के नाम से प्रसिद्ध थे। वे भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये, उन्होंने जापान के सहयोग से आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया था। उनके द्वारा दिया गया "जय हिन्द" का नारा भारत का राष्ट्रीय नारा बन गया है। "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" का नारा आज भी हमारी रागों में दौड़ता है। आजाद हिन्द फौज के माध्यम से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने का नेताजी का प्रयास प्रत्यक्ष रूप में तो सफल नहीं हो सका किन्तु उसका दूरगामी परिणाम अवश्य हुआ। सन् 1946 के नौसेना विद्रोह इसका उदाहरण है। नौसेना विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जीवन हम सब के लिए असीम प्रेरणा का स्रोत है। उनके संघर्ष की कहानी हमें सदियों तक प्रेरित करती रहेगी। ट्रस्ट के उपाध्यक्ष वेदप्रकाश पाराशर ने बताया कि 23 जनवरी 1926 को बाल ठाकरे, भारतीय राजनेता और शिवसेना के संस्थापक का जन्म हुआ था। ट्रस्ट के पदाधिकारी अशोक मंडल ने बताया कि 23 जनवरी 2009- फिल्मी और टेलीविज़न कार्यक्रमों में धूम्रपान दृश्यों पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो गया ये फेसला हमारी समाज को बिगाड़ने में बहुत बड़ा योगदान कर रहा है आज के समय में TV पर जैसा छोटे छोटे बच्चे देखते हैं वैसा ही करते हैं हमें अपने छोटे बच्चों के उपर अधिक ध्यान देना पड़ेगा राष्ट्रीय महामंत्री ह्रदयेश सिंह  ने नेताजी के जीवन पर प्रकाश डालते हुये बताया कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे, वहीं सुभाष चंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के विचार भिन्न-भिन्न थे लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गाँधी और उनका मक़सद एक है, यानी देश की आज़ादी। सबसे पहले गाँधीजी को राष्ट्रपिता कह कर नेताजी ने ही संबोधित किया था।
1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी। 1939 में बोस पुन एक गाँधीवादी प्रतिद्वंदी को हराकर विजयी हुए। गांधी ने इसे अपनी हार के रुप में लिया। उनके अध्यक्ष चुने जाने पर गांधी जी ने कहा कि बोस की जीत मेरी हार है और ऐसा लगने लगा कि वह कांग्रेस वर्किंग कमिटी से त्यागपत्र दे देंगे। गाँधी जी के विरोध के चलते इस 'विद्रोही अध्यक्ष' ने त्यागपत्र देने की आवश्यकता महसूस की। गांधी के लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्वयं कांग्रेस छोड़ दी।
इस बीच दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। उनके विचारों के देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नज़रबंद कर लिया लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग निकले। वह अफगानिस्तान और सोवियत संघ होते हुए जर्मनी जा पहुंचे। सुभाष चंद्र बोस ने 1937 में अपनी सेक्रेटरी और ऑस्ट्रियन युवती एमिली से शादी की। उन दोनों की एक अनीता नाम की एक बेटी भी हुई जो वर्तमान में जर्मनी में सपरिवार रहती हैं। नेताजी हिटलर से मिले। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और देश की आजादी के लिए कई काम किए। उन्होंने 1943 में जर्मनी छोड़ दिया। वहां से वह जापान पहुंचे। जापान से वह सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने कैप्टन मोहन सिंह द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान अपने हाथों में ले ली। उस वक्त रास बिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज का पुनर्गठन किया। महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का भी गठन किया जिसकी लक्ष्मी सहगल कैप्टन बनी।
'नेताजी' के नाम से प्रसिद्ध सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया। 18 अगस्त 1945 को टोक्यो (जापान) जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है। ट्रस्ट की पदाधिकारी विमलेश देवी ने बताया कि जब 23 जनवरी 1966: इंदिरा गांधी भारत की तीसरी प्रधानमंत्री बनीं थीं । उस समय से आज के समय में बहुत अंतर है हम लेड़ीजों को हर काम में बढ़ चढ़ कर भाग लेना चाहिए महिला वर्ग किसी से कम नहीं हैं इस मौकेपर अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार शर्मा, उपाध्यक्ष वेदप्रकाश पाराशर, कोषाध्यक्ष सौनू सागर, सचिव महेश वत्स, उपाध्यक्ष अशोक मंडल, महामंत्री ह्रदयेश सिंह, पदम सिंह, पुष्पेन्द्र शर्मा, राजीव गुप्ता, राहुल सिंह, विजय कुमार, विमलेश देवी, उर्मिला फौजदार,बिरेन्द्र सिंह, पुष्पेन्द्र सिंह, मनीषा देवी, रूपन देवी, बेबी देवी, पूनम चौधरी, सुबोध कुमार साह,  करण वीर, विक्की, धर्मेंद्र मंडल, विजय कुमार आदि और अखिल भारतीय मानव कल्याण ट्रस्ट के सभी कार्यकर्ता अभिजात मिडिल स्कूल के टीचर्स व बच्चे उपस्थित थे

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