Thursday, December 27, 2018

तेजी से सुख रहे प्राकृतिक जल स्रोत पहले बचाने होंगे, अन्यथा देश में होगा घोर जल संकट ;नौला फाउंडेशन


पिथौरागढ़(abtaknews.com) 27 दिसंबर : सीमांत शहर पिथौरागढ़ में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला '''नीर, नदी और नौले" में प्रदेश भर के जाने माने वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी विभागों के प्रतिनिधियो ने अपनी बात रखी और एकमत से  इस गंभीर विषय को एकमत से सरकार को ये सुझाव दिया की अगर समय पर उत्तराखंड के तेजी से सुख रहे नौले धारे गधेरों को नहीं बचाया गया तो 90 फीसदी नदियां सूख जाएगी या उनमे पानी बहुत कम हो जायेगा ढ्ढ इस महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन उत्तराखंड विज्ञान, शिक्षा एवं अनुसन्धान केंद्र, देहरादून और नौला फाउंडेशन के संयुक्त प्रयास से लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में किया गया ढ्ढ जिसमे ।  इसी परिपेक्ष्य में प्राचार्य देवराज सिंह पांगती, निदेशक दुर्गेश पंत, हेम चंद्र पाण्डेय, नवीन चन्द्र जोशी, राजेन्द्र सिंह राणा, बिशन सिंह, जी सी एस नेगी, राम अवतार सिंह, हेमंत जोशी, रेखा पांडेय,  कल्याण सिंह रावत, राजेंद्र बिष्ट, बिपिन चंद्र जोशी, हेमंत पांडेय, अनिल श्रीवास्तव, कमल किशोर पांडेय, किशन भट्ट, स्वामी वीत तमसो, गगन प्रकाश सिंह, खेम सिंह कठायत, संदीप मनराल, किशन कठायत, मनोज पांडेय आदि वक्ता ने इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कार्यशाला में उत्तराखंड में कुदरती जलचक्र के महत्त्वपूर्ण घटक नौले-धारे, जल, जंगल और जमीन के संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्राकृतिक आपदा जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की ढ्ढ
वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं निदेशक दुर्गेश पंत ने बताया की उत्तराखण्ड के तमाम वर्गों के लिये आवश्यक है कि वे प्राकृतिक धरोहरों और संसाधनों के स्थानीय संरक्षक की भूमिका और लोक संचित ज्ञान के आधार पर अपनी जल-वन-भूमि से सम्बन्धित योजनाएँ बनाकर आज ग्राम स्तर पर लोगों को जागृत करने की जरूरत है, विकास के हर पहलू पर एक साथ चर्चा की शुरुआत के लिए हम सब बैठें, उसे सक्रिय बनाने के लिए भविष्य की रणनीति पर चर्चा करें, जिससे सरकार को जान सामान्य के लिए व्यापक नीति बनाने में मदद मिलेगी और क्षेत्रीय स्तर पर कार्यरत सरकारी, गैर सरकारी सस्थांये जान भागीदारी के साथ बेहतर परिणाम ला सकती हैं ढ्ढ नौला फाउंडेशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता स्वामी वीत तमसो ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन ने पूरे विश्व का मौसम चक्र बिगाड़ दिया है और विकास की अंधी दौड़ मै भारी उद्योगीकरण, जनसख्या विस्फोट और पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई, भूस्खलन, बड़े बड़े डैम का निर्माण, संवेदनशील हिमालय पर गहरी चोट भी इन प्राकृतिक जल स्रोत नौले धारे एवं गधेरों का जल स्तर गिरना बहुत ही चिंतनीय हैं जिसका परिणाम स्वरुप पूरे देश में पेय जल की समस्या पैदा हो गयी है ढ्ढ  मौसम के बिगड़ने से भी पेयजल के पृाकतिक जल सृोत स्वत: रिचार्ज नहीं हो पाते ढ्ढ 
नौला फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिशन सिंह ने बताया जब हमारे पारम्परिक जलस्रोत नौले, धारे, गधेरे सुरक्षित रह पाएंगे तभी मां गंगा और सहायक नदियों में पानी होगा और तभी हमारे देश की प्यास उत्तराखंड राज्य बुझायेगा । उत्तराखंड का विकास तभी संभव है जब यहां की स्थानीय जनता का विकास होगा। हमारा मानना है कि अति संवेदनशील परिस्थितिकीय व पर्यावरण से तालमेल बिठाकर एक नई दृष्टि, संवेदना चाहिए। इससे भी बड़ी जरूरत यह है कि इसमें यहां के निवासियों की सक्रिय भागीदारी तो हो ही, साथ ही साथ भारत के आम नागरिक की भी भागीदारी हो। 
पर्यावरणविद वैज्ञानिक नवीन जोशी ने बताया की आज धरती का तापमान बढ़ने से जलवायु परिवर्तन की जो स्थितियाँ बनी हैं उनके कारण उत्तराखण्ड जैसे क्षेत्र में नौले- धारे सूख रहे हैं या सुख चुके हैं और इसके लिये हम सब  जिम्मेदार हैं । आदिकाल से लेकर आज के अत्याधुनिक युग तक को देखें तो सहज ही मालूम हो जाएगा कि मनुष्य के अलावा धरती पर कोई भी जीव-जन्तु नहीं है जिसने अपनी जीवन-पद्धति में कोई आमूल परिवर्तन किया हो। जिन जीव-जन्तुओं ने अपनी जीवन-पद्धति में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया भी है, उसके लिये भी मानव ही दोषी है। उत्तराखण्ड के पर्यावरण-पारिस्थितिकी से समाज का हिमालयी क्षेत्र सदियों से पानी, पहाड़ों, नदियों, जलवायु, जैवविविधता एवं वृहत्त सांस्कृतिक विविधता का मूल रहा है। लेकिन गंगा-यमुना नदियों का उद्गम स्थल उत्तराखण्ड, जो समस्त उत्तर भारत को सिंचता है, आज खुद प्यासा है। यहाँ पानी का मुख्य माध्यम प्राकृतिक जल स्रोत है। जो वनाच्छादन की कमी, वर्षा का अनियमित वितरण एवं अनियंत्रित विकास प्रक्रिया के कारण सूखते जा रहे हैं।
कार्यशाला सचिव और इतिहासकार हेम पाण्डेय ने बताया कि आज भी उत्तराखंड में सातवी - आठवीं शताब्दी के बने हुए नौले धारे में आज भी पानी  हैं परन्तु अत्यधिक जनसंख्या के कारण जल सहित धरती के सीमित संसाधनों और धरोहरों पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है। कृषि-खेती, भोजन, आवास जैसी मूल समस्याएँ बढ़ रही हैं। पानी की उपलब्धता कम होने के कारण स्वास्थ्य भी संकट में है और इन समस्याओं के बढ़ने से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी सामने आ रहे हैं। समाज में हिंसा बढ़ रही है, मानवीय रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं और संक्षेप में समाज बिखर रहा है।
ऐसे में जब जलागम की पाइप लाइनें, स्वजल द्वारा लगाए गए हैण्डपम्प से पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब लोगों का ध्यान प्राकृतिक स्रोतों की ओर जाता है। जो आज मरणासन्न की स्थिति में हैं।
उत्तराखण्ड में तो विश्व बैंक की स्वजल योजना ने जल-संस्कृति का नाश करने में बड़ी भूमिका निभाई है। विकास की इस तथाकथित नई सोच ने बहुत कुछ बदल दिया है। जहाँ धारे, पंदेरे, मगरे और नौले हुआ करते थे, वहाँ विश्व बैंक की इस योजना ने अपने नल लगा दिये और प्रकृति के कर्म को अपना कर्म दिखा दिया। आज ऐसे स्थानों पर जल निगम या जल संस्थान के नल उग आये हैं। ये न तो देखने में सुन्दर लगते हैं और न ही स्थानीय परिवेश के अनुकूल दिखाई देते हैं। पर विवशता यह कि इनके बिना कोई चारा भी नहीं। जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और पानी का संकट बढ़ता जा रहा है। नौला फाउंडेशन ने थामण को एक आदर्श गांव बनाने में श्री खेम सिंह कठायत जी और उनके अनुज श्री किशन सिंह कठायत जी की अगुआई में नयी सोच नयी दिशा और जय माँ काली महिला मंगल दल की सदस्यों को एकजुट करकें विभिन्न जन जागरूकता कार्यक्रम की योजना बनाई। गांव में नौला और जल स्रोतों के बावजूद गर्मी के दौरान गांव में गंभीर पानी की कमी है, अब ज्यादातर सूख गए हैं; वहां एक जल योजनाएं (स्वजल) रही  हैं जिसमें ज्यादातर समय गांव में पानी की आपूर्ति नहीं की जाती है। ऐसी पानी की किल्लत से परेशान होकर इस गांव के ज्यादातर लोग अपनी आजीविका के लिए शहर पलायन कर गए हैं । गगास नदी के किनारे पहाड़ी इलाके में स्थित होने के बावजूद इस गांव में गर्मियों में पानी की भारी कमी होती हैं। अतीत में यह क्षेत्र प्राकृतिक नौले, धारे, गधेरे आदि जल संसाधनों से भरा है लेकिन अब वे सूख गए हैं, पूरे क्षेत्र में चीड़ के जंगल और कंक्रीट के घर बन गए हैं । अब नौला फाउंडेशन ने स्थानीय ग्रामीणों की मदद से जल संरक्षण के प्रयासों के अलावा पानी के स्रोतों को रिचार्ज करने के महत्व को समझने के लिए अपने ग्रामीण क्षेत्रीय सहभागिता के सफल प्रयोग के साथ इस गांव की प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्य को पुनर्जीवित और पुनर्स्थापित करने के लिए कदम उठाए हैं। तो यहां हमारे पास उन्हें जीवित बनाने और पीने, खेती, मवेशी उपयोग आदि के लिए अपने पानी का उपयोग करने की आशा की थोड़ी किरणें हैं। ये उपाय कठिन हैं पर दीर्घकालीन होगा और थामण गांव को एक आदर्श गांव बनाने में मददगार साबित होगा। स्थानीय ग्रामीणों और नौला मित्रों स्वयंसेवकों की मदद से नौला फाउंडेशन ने विशेष प्रकार के चाल खाल के साथ साथ, कॉन्टूर ट्रेंच, पारिस्थितिक जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भारी विशेष जल छिद्रण बागान को फिर से बनाया , छोटे पिट बैंड, चाव /कॉन्टूर ट्रेंच और विशेष प्रजाति के पौंधों का पौधारोपण करके कुछ ही समय में जल संकट से छुटकारा पा सकते हैं।

No comments:

Post a Comment

Post Top Ad

Your Ad Spot

Pages