Tuesday, October 2, 2018

सतयुग दर्शन ट्रस्ट अपने अभूतपूर्व प्रयास से बाल-युवाओं को मानवता के लिए कर रहा प्रेरित

फरीदाबाद(abtaknews.com) व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर, सजनों  के नैतिक उत्थान हेतु दृढ़ संकल्पी सतयुग दर्शन ट्रस्ट ने सभागार में 12 से 22 साल के बाल-युवाओं के लिए नवता का प्रसंग - युवाओ के संगज् नामक कार्यक्रम/प्रतियोगिता का आयोजन किया। इस प्रतियोगिता के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों से आए लगभग एक सौ एक बच्चों को  मानवता, गुरु, शरीर नहीं है। इस विषय पर अपने विचार हिन्दी या अग्रेजी में ज़बानी व्यक्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। सार में बच्चों ने मानवता के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि च्हम ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कलाकृति मानव हैं। मानव होने के नाते मानवता ही एकमात्र हमारा अपना व मु2य धर्म है। कुदरत प्रदत्त यह धर्म नित्य है, अपने आप में परिपूर्ण है, निद्र्वन्द्व है, निर्विवाद है व सदाबहार है यानि परिस्थितियों के अनुसार कभी बदलता नहीं अपितु हर समयकाल में एकरस बना रहता है और समपूर्ण मानव जाति को समभाव-समदृष्टि की युक्ति अनुरूप, एक भाव-भावना-नज़रिया व स्वभाव अपना कर, आत्मियता के व्यवहार में ढ़ल, एकता में बने रहने का संदेश देता है। यही मानवता ही समस्त सद्गुणों का बीज है जो सदा ह्मदय में विद्यमान रहता है और श4द ब्राहृ विचारों से सींचने पर मानवीय चरित्र के रूप में फलता-फूलता है। युक्तिसंगत की गई इस सिंचाई से ह्मदय की समुच्चय व्यवस्था का वातावरण विशुद्ध बना रहता है फलत: मानव की वृत्ति, स्मृति, बुद्धि व भाव-स्वभावों का ताना-बाना निर्मल बना रहता है। इसके अतिरिक्त एक बच्चे ने यह भी कहा कि आज हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि, श4द ब्राहृ जो आध्यात्मिक विद्या का परिचायक है, उस को ग्रहण करने पर ही मानव के मन में आत्मियता युक्त मानवता जाग्रत होती है। अत: इंसानियत में आने के लिए, आध्यात्मिक विद्या को पढ़-समझ कर, अंतर्विद्यमान मानवता रूपी गुण का निपुणता से विकास करते हुए उसका प्रयोग करने की कला सीखनी आवश्यक है।
कुछ युवाओं ने कार्यक्रम को देखने आए अपने हम उम्र बच्चों व अभिभावको को मानवता अपनाने के प्रति आवाहन् देते हुए कहा कि जागो, होश में आओ और नैतिक पतनता से उबरने हेतु, दृढ़ संकल्पी बनो। ताकतवर होकर बुराईयों से ऊपर उठो व मानव धर्म पर स्थिर बने रह, अपने मन को पुन: परमानन्द प्रदान करने वाली परमशक्ति का अनुभव करा, पराक्रमी बन जाओ। नि:संदेह ऐसा होने पर ही एक अनूठे सच्चरित्र मानव के रूप में, इस ब्राहृांड में आपकी कदर होगी और चहु ओर आपका यशगान होगा। तत्पश्चात् काफी देर सभागार इन नारों से गुंजायमान रहा:-
मानव धर्म हमारा है, मानव धर्म हमारा है।
इसकी संगत से लगता, हर मानव प्यारा है।।
इसके अतिरिक्त सजनों इस कार्यक्रम में बाल-युवाओं ने युगों-युगों से प्रचलित द्वेत भाव युक्त बंधनमान सेवक-स्वामी, भक्त-भगवान व गुरु-चेले वाले आडमबरमय, कर्मकांडमय बाल अवस्था वाले भक्ति भावों को नकारते हुए, युवा अवस्था का स्वतन्त्र भक्ति भाव अपनाने हेतु  च्श4द है गुरु, शरीर नहीं हैज्, इस की महत्ता को भी बड़े ही खूबसूरत ढंग से प्रस्ततु किया। इसके अंतर्गत बच्चों ने स्पष्ट किया कि  अंतर आत्मा में स्थित श4द रूपी परमात्मा के अतिरिक्त किसी दूसरे को यानि तस्वीर, मूर्ति या शरीरधारी को गुरु मानने का अर्थ है आत्मतत्व से नाता तोड़ मिथ्या तत्वों से समबन्ध जोड़ आध्यात्मिकता के मार्ग से भटक जाना अर्थात् अज्ञानियों की तरह सांसारिक स्वार्थपूर्ण अन्तहीन इच्छाओं की ओर आकर्षित हो मृतलोक में आवागमन के दुष्चक्र में फँसे रहना। हमें इस भवचक्र में नहीं फँसना इसलिए हमें श4द से अपना नाता जोडऩा है। श4द यानि प्रणव-मंत्र ओ3म् जो अत्यन्त पवित्र, नित्य, स्थिर, दृढ़, अनश्वर, अविनाशी, स्वयंभू व परब्राहृवाचक यानि परमात्मा को व्यक्त, प्रकट या सूचित करने वाला श4द है व जो हर पदार्थ के अन्दरूनी (आध्यात्मिक) व बैहरूनी (भौतिक) ज्ञान के प्रकटन का रुाोत व सुरत व श4द के मिलन का व विलीन होने का केन्द्र बिन्दु है। हकीकत में यही हर इंसान का गुरू यानि आध्यात्मिक पथप्रदर्शक है और परमानन्द की प्राप्ति हेतु दिव्यता की खिडक़ी खोलने की कुंजी है।

एक बच्चे ने तो यहाँ तक कहा कि सार्थक ध्वनि के रूप में आत्मिक ज्ञान प्रदान करने वाला हमारा यह नित्य, अजर-अमर, गुरु ही न केवल हमारे नित्य असलियत स्वरूप की पहचान कराने में अपितु उस ब्राहृ और इस ब्राहृांड का हर रहस्य जनाने में पूर्ण सक्षम है तथा एकमात्र ऐसा रुाोत है जो सर्व को एक सूत्र में बाँध, सबके मन-मस्तिष्क को एक ही तरह के आत्मिक ज्ञान के प्रवाह से भरपूर कर, सर्व कला समपूर्ण बना सकता है और द्वैत युक्त भाव समाप्त कर समभाव स्थापित कर सकता है। इस प्रकार अपनी स्वतन्त्र मुक्त प्रकृति में बने रह ऐ1य भाव में आने पर हमारा आचार, विचार व व्यवहार सत्य-ज्ञान की मर्यादा में सदैव सधा रह सकता है और हम सजन-भाव और गृहस्थ धर्म के वचनों पर परिपक्वता से खड़े होकर इस जगत में अपना फज़ऱ्-अदा निर्लिप्तता से संकल्प रहित होकर, हँसकर निभा सकते हैं।

नि:संदेह सजनों बच्चों के मुक्त विचार सुन कर सभी मंत्र मुग्ध रह गए। इस अवसर पर उपस्थित ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने बच्चों के विचारों की तहे दिल से सराहना करते हुए उन्हें युग परिवर्तन के महत्तवपूर्ण कार्य में अपना सहयोग देने के लिए श4द को गुरु मान, उस द्वारा प्राप्त श4द ब्राहृ विचारों पर मजबूती से डटे रहते हुए मानव धर्म पर सुदृढ़ बने रहने का आवाहन् दिया और कहा कि परिवर्तन के इस दौर में प्रत्येक क्षण व्यतीत होने के साथ-साथ जैसे-जैसे सतयुग का पदार्पण हो रहा है उसी त्वरित गति से कलुकाल का भी पर्दाफाश होता जा रहा है और वह सिमटता जा रहा है। अत: आवश्यकता है समय रहते अपने अन्दर भाव-स्वभाविक तबदीली ला, आने वाले स्वर्णिम युग में प्रवेश पाने हेतु खुद को व सबको तैयार करने की 1योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता यानि वह निर्धारित क्रमानुसार चलता ही रहता है और जो उसकी इस चाल को समझ कर उसके संग हो लेता है वही सदा आनन्द में रहता है। अत: वक्त से ही सत्य को ग्रहण/धारण करो ओर अपना जीवन आबाद कर सतयुग में प्रवेश पा विश्राम को पाओ।


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