Wednesday, August 22, 2018

देशभर में मुसलमानो ने ईद-उल-जुहा(बकरीद) पर नमाज अता कर, गले मिलकर कहा ईद मुबारक

Muslims all over the country praying at Id-ul-Zuha (Bakrid), together with the words Eid Mubarak
फरीदाबाद (abtaknews.com) 22 अगस्त,2018; मुसलमान समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार ईद है। दो ईद होती हैं पहली पवित्र रमजान के महीने में 40 दिन के रोजे के बाद ईद-उल-फितर और उसके ठीक 2 महीने बाद ईद-उल-जुहा यानि बकरीद आती है। ईद पर मुस्लिम समाज के लोग कुर्बानी देते हैं। इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक पैगंबर हजरत इब्राहिम जिनके समय से बकरीद की शुरुआत हुई। वह हमेशा बुराई के खिलाफ लड़े। उनका सारा जीवन दूसरों की मदद और सेवा में बीता।
पैगंबर हजरत इब्राहिम की 90 साल की उम्र तक कोई औलाद नहीं हुई तो उन्होने खुदा से इबादत की और उन्हें चांद से बेटा इस्माईल के रूप में मिला। उन्हें सपने में आदेश आया कि खुदा की राह में कुर्बानी दो। पहले उन्होंने ऊंट की कुर्बानी दी। इसके बाद उन्हें सपने आया कि सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दो। इब्राहिम ने सारे जानवरों की कुर्बानी दे दी। उन्हें फिर से वही सपना आया, इस बार वह खुदा का आदेश मानते हुए बिना किसी शंका के बेटे के कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी हाजरा से बच्चे को नहला-धुलाकर तैयार करने को कहा।
 इब्राहिम जब वह अपने बेटे इस्माईल को लेकर बलि के स्थान पर ले जा रहे थे तभी इब्लीस (शैतान) ने उन्हें बहकाया कि अपने जिगर के टुकड़े को मारना गलत है। लेकिन वह शैतान की बातों में नहीं आए और उन्होंने आखों पर पट्टी बांधकर कुर्बानी दे दी। जब पट्टी उतारी तो बेटा उछल-कूदकर रहा था तो उसकी जगह बकर यानी बकरे की बली खुदा की ओर से कर दी गई। हजरत इब्राहिम ने खुदा का शुक्रिया अदा किया। इब्राहिम की कुर्बानी से खुदा खुश होकर उन्होंने पैगंबर बना दिया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जिलहिज्ज के इस महीने में जानवरों की बलि दी जाती है। इसलिए बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाती है।मुसलिम समाज यदि कुर्बानी अपनी बुराइयों की दें तो दुनिया को एक नई और अच्छी दिशा मिल सकती है। आज ईद-उल-जुहा पर देशभर में ईद की नमाज अता की गई। दिल्ली एन सी आर में फरीदाबाद के विभिन्न मस्जिदों में मुसलामनों ने ईद की नमाज पढ़ी एक दूसरे को गले मिलकर ईद मुबारक की। 

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