Saturday, April 7, 2018

अश्वनी त्रिखा को सबक सिखाने के लिए नये प्रत्याशी बाबी रावत को एकजुट होकर जिताया


फरीदाबाद(abtaknews.com ) 07 अप्रैल,2018 ; अश्वनी त्रिखा का कांग्रेसी वकील जेपी अधाना, हरीश चैतल और मनोज अरोड़ा की टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला उल्टा पड़ा। ओम प्रकाश शर्मा गुट का अंदरूनी समर्थन भी काम नही आया कांग्रेसी वकीलों से  अश्वनी त्रिखा का चुनावी टिकट जातिवाद के नाम पर लेना एक भाजपा के पुराने दिग्गज वकील जो राजनीति के साथ बार मे भी स्तम्भ माने जाते है को नागवार गुजरा और  फिर वर्षो बाद सक्रिय हो कर उनके खेमे ने राजनीति की वो गोटिया खेली  कि क्या  कांग्रेस और क्या भाजपा सभी ने त्रिखा को सबक सिखाने में लग गए रातो रात नया ग्रुप बना कर बाबी रावत को मुकाबले में उतार दिया गया जातिगत समीकरण भी नए सिरे से बना दिए गए जाट, ठाकुर और गुज्जर नए ग्रुप में चले गए । ग्रुप की कमान एक ब्राह्मण और एक गुज्जर  पूर्व बार के प्रधानो ने भाजपा के पंजाबी नेता के साथ मिल कर संभाल ली ।  बस यंही से सारा खेल शुरू हुआ। पंजाबी और वैश्य समाज पर भी इस नए गुट के अपनी अच्छी पकड़ बना ली जो निर्णायक साबित हुआ।

कमाल की बात तो ये रही कि शिव दत वशिष्ट को अपने पैनल के सेक्रेटरी पद के दावेदार से भी कम वोट मिली जिसका सीधा इशारा ओम प्रकाश गुट के त्रिखा की तरफ खिसकने की पुष्टि करता है।अश्वनी त्रिखा ने मामला बिगड़ता देख गलती सुधारने के लिये अपने  आप को केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुज्जर का समर्थित उम्मीदवार घोषित कर दिया जबकि वास्तविकता में केंद्रीय मंत्री किसी तरह से चुनाव में कोई भागीदारी नही कर रहे थे और ना ही केन्द्रीय मंत्री ने किसी वकील को त्रिखा के समर्थन के लिये फोन किया  परंतु ये अश्वनी द्वारी चली चाल भी त्रिखा पर ही उल्टी पड़ी इस घोषणा के फलस्वरूप की केंद्रीय मंत्री त्रिखा के समर्थन पर उतर आए है  पूर्व  कांग्रेस मंत्री महिंदर प्रताप सिंह  सक्रिय हो गए । नतीजन अश्वनी त्रिखा चारो तरफ से घिर गए और ओम प्रकाश शर्मा गुट की अंदरूनी मदद हासिल करना भी कम ना आया। भाजपा से जुड़े वकीलों का कहना है कि
केंद्रीय मंत्री कृष्ण पाल गुज्जर का नाम चुनाव में बेकार में घसीटा गया उनका इसमे कोई लेना देना नही था और  ना ही भाजपा का इस चुनाव से कोई लेना देना नही था। भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि चुनाव लड़ने का निर्णय अश्वनी त्रिखा का व्यक्तिगत निर्णय था जो शायद उन्होंने अपने कांग्रेसी मित्रो के कहने पर लिया था न कि भाजपा के कहने पर।बड़खल विधान सभा के कुछ सीमा त्रिखा समर्थक और शराब के ठेकेदार  इस चुनाव में खासे सक्रीय दिखे थे। 

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