Friday, March 16, 2018

जिद और जुनून के लिये हिंदी साहित्य के नाम की कुंद्रा साहब ने अपनी जिंदगी



नेहरू ग्राउंड मुख्य डाकख़ाने के निकट 72 साल की उम्र में किराये की जर्जर दुकान में पुस्तकें बेचते हैं कुंद्रा साहब
फरीदाबाद16 मार्च(abtaknews.comदुष्यंत त्यागी ) अगर जिंदगी में कुछ कर गुजरने की जिद हो और उसे आप अपना जुनून बना लें तो जरूर मुकाम हासिल होता है ऐसा ही कर दिखाया है 72 साल के बुजुर्ग जे के कुंद्रा ने,, जिन्हें शहर में कुंद्रा साहब के नाम से जाना जाता है। उन्होंने यह इज्जत और रुतबा अपनी जिद और जुनून की बदौलत हासिल की है। 42 वर्षों से हिंदी साहित्य को किराए की एक जर्जर सी दुकान में संजोहकर रखने वाले जे के कुंदरा उम्र के इस पड़ाव में आ कर महज अपना, पत्नी और दुकान का खर्च ही निकाल पाते हैं । बाकी सब बच्चों को प्रेरित करने वाली पुस्तके बांटने में खर्च कर देते हैं । 1976 से साहित्य को प्रेम करने वाले कुंद्रा साहिब का प्रण है कि अंतिम सांस तक इस साहित्य कि किताबों से भरी हुई दुकान को चलाते रहेंगे। टूटी फूटी जर्जर एक छोटी सी दुकान में रखी हिन्दी साहित्य की किताबों को संवारते हुए दिखाई दे रहे ये बुजुर्ग जे के कुंद्रा साहब हैं जो कि पिछले 42 सालों से इसी किराये की दुकान में हिंदी साहित्य को संजोह कर रखे हुए हैं। दुकान में देश की आजादी से लेकर डिजीटल युग और बाबा आदम से लेकर चाणक्य तक के जमाने के साहित्य उपलब्ध हैं, जिसमें सोशल साहित्य, या व्यक्ति विशेष भी है। 60 साल की उम्र में सेवानिवृत्त होने वाले लोगों को संदेश देने वाले कुंद्रा साहब आज 72 साल की उम्र में भी रोजाना दुकान पर आकर पुस्तकों से प्रेम करने वाले लोगों का इंतजार करते हैं, इतना ही नहीं उन्होंने दुकान के बाहर लिखा भी हुआ है कि पुस्तकों से प्यार करो,, क्योंकि उन्होंने स्वयं पुस्तकों से प्यार किया है और इसी प्यार के साहरे पूरा जीवन निकाल दिया। मगर उनका प्यार आज भी पुस्तकों के प्रति वैसा का वैसा ही है आज भी खुद कुंद्रा साहब अकेले बैठे हुए किताबें पढते हुए ही नजर आते हैं।

पूरी जिंदगी हिंदी साहित्य के नाम करने वाले जे के कुंद्रा साहब की माने तो उन्होंने सन 1976 में बीके चौक के पास नेहरू ग्राउंड में एक छोटी सी किराये पर दुकान लेकर पुस्तकों की शुरूआत की, शुरूआत में उनकी इस पुस्तकों की दुकान पर बहुत कम लोग ही आये जो आये वो ऐसी पुस्तकों की मांग करते थे जिन्हें वो रखते ही नहीं थे,, क्योंकि उन्होंने अपने पुस्तक भण्डार में हिंदी साहित्य को प्राथमिकता दी ताकि लोगों में हिंदी और संस्कृति के लिये प्यार बना रहे,, कुछ समय गुजर जाने के बाद कुछ साहित्य के प्रेमी आये और उन्होंने पुस्तकें पढना शुरू किया, फिर क्या था उन्हें अपने जुनून में साहरा मिला और इसी जुनून को जिद बनाकर उन्होंने ठान लिया कि चाहे अंजाम कुछ भी अब बस पूरी जिंदगी साहित्य के नाम करनी है। इस जुनून में उनका साथ उनकी धर्मपत्नी ने भी दिया और धीरे - धीरे सालों बीत गये। इस दौरान ऐसा वक्त आया कि दुकान से परिवार का खर्चा चलना भी मुश्किल हो गया और आमदनी की तो उम्मीद ही नहीं थी, उस वक्त ऐसा लगा कि बस अब मैं ये दुकान नहीं चला पाउंगा और मेरी दुकान बंद होने से कोन सा फर्क पडेगा जिसको किताब पढनी होगी तो वह कहीं से भी खरीद लेगा, लेकिन मन और दिल ने गवाही नहीं दी और फिर खुद से ही लडना शुरू कर दिया, बस इसी खुद की लडाई में कुंद्रा साहब ने 42 साल किराये की दुकान में ही निकाल दिये, उनका सपना था कि खुद की एक बडी सी दुकान हो जिसमें वह बहुत बडी लाईब्रेरी खोलें मगर वो सपना एक सपना ही रह गया। क्योंकि जब उन्होंने 1976 में दुकान किराये पर ली तो कीमत 20 हजार थी और अब 80 लाख बस पूरी जिंदगी सपना पूरा करने की जदोहजद में निकल गई। अब तो बस यहीं सपना है कि इस किराये की दुकान में ही जब अंतिम सांस है तब तक साहित्य का ज्ञान लोगों तक पहुंचाता रहूं। अब एक नजर इस दुकान और इसमें मिलने वाली सुविधाओं पर भी डालते हैं, इस दुकान में गर्मियों से बचने के लिये न तो फंखा है और नहीं कूलर एसी,, चाहे गर्मी हो या सर्दी मौसम के वातावरण में ही पूरी जिंदगी गुजारी गई है। दुकान की अवस्था किसी हाई फाई दुकान या शोरूम की तरह नहीं है जिसकी चमक धमक देखर लोग प्रभावित हों और पुस्तक खरीदने के लिये आये,, बी के चौक के नेहरू ग्राउंड में बनी ये छोटी सी दुकान प्रिंटफोर्ट बुक शॉप के नाम से हैं जिसमें एक दिन में दो चार साहित्य प्रेमी आये तो ठीक नहीं पूरा दिन ऐसे ही इंतजार में गुजर जाता है।

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