Friday, March 23, 2018

सराय ख्वाजा के सरकारी स्कूल में शहीदी दिवस पर शहीदों को किए श्रद्धासुमन अर्पित


फरीदाबाद(abtaknews.com) 23 मार्च,2018; सराय ख्वाजा राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय की जूनियर रेड क्रॉस और  सैंट जॉन एम्बुलेंस ब्रिगेड ने शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में देश पर जान न्योछावर करने वाले  शहीदे आज़म भगत सिंहराजगुरु  सुखदेव  के अमर बलिदान की गाथा बताते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए 
इस अवसर पर प्राचार्य नीलम कौशिक, विद्यालय के जूनियर रेड क्रॉस व् सैंट जॉन एम्बुलेंस ब्रिगेड अधिकारी रविंदर कुमार मनचंदा, ब्रह्मदेव यादव, ईश कुमार, संजय मिश्रा, सुनील पाराशर, संदीप सहित अन्य अध्यापक और अध्यापिकाओं ने शहीदों के बलिदान को याद करते हुए बारम्बार नमन किया ।  रविंदर कुमार मनचंदा ने बच्चोंऔर अध्यापकों को बताया कि  भारतमाता के सच्चे वीर सपूतों शहीदे आज़म भगत सिंहराजगुरु  सुखदेव  को 1931 में आज ही के दिन को फांसी दी गई थी। आजादी के इन मतवालों का जिक्र जब भी होता है तो हर भारतीय का सीना फक्र से चौड़ा और आंखें गर्व से नम हो जाती है। भगत सिंह का जन्म पंजाब के किसान सरदारकिशन सिंह के घर हुआ थाइनकी मां का नाम विद्यावती कौर था13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने एक पढ़ने लिखने वाले सिख लड़के की सोच कोही बदल दियालाहौर में स्कूली शिक्षा के दौरान ही उन्होंने यूरोप के अलग अलग देशों में हुई क्रांति के बारे में अध्ययन कियाभगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लियेनौजवान भारत सभा की स्थापना की थी इसके बाद भगत सिंह पं.चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गये थेजिसकेबाद इस संगठन का नाम हो गया था हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशनइस संगठन का उद्देश्य सेवात्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयारकरना था।
आपमें से बहुत कम लोग जानते होंगे कि शिवराम हरि राजगुरु महाराष्ट्र के रहने वाले थेउनका जन्म पुणे के पास खेड़ नामक गांव अब  राजगुरु नगर में हुआथाबचपन से ही राजगुरु के अंदर जंग--आज़ादी में शामिल होने की ललक थी। वे महाराष्ट्र के देशाथा ब्रह्मण परिवार से थे। उनके परिवार का शांत साधारण जीवन था,लेकिन उनके जीवन में अशांति तब आयीजब होश संभालते ही उन्होंने अंग्रेजों के जुल्म को अपनी आंखों के सामने होते देखा और यहीं से उन्होंने प्रण किया कि वो अपनीभारत माता को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराएंगे।
ऐसी ही सोच देश लाल सुखदेव थापर की भी थीइनका जन्म पंजाब के शहर लायलपुर में श्री रामलाल थापर औरश्रीमती रल्ली देवी के घर पर 15 मई 1907 को हुआ थासुखदेव और भगत सिंह दोनों 'लाहौर नेशनल कॉलेजके छात्र थे आश्चर्य है कि दोनों ही एक ही वर्ष में लायलपुरमें पैदा हुए थे और एक ही साथ शहीद हुए23 मार्च 1931 की रात भगत सिंहसुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया गयाकहा जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24मार्च की सुबह तय की गई थी लेकिन किसी बड़े जनाक्रोश की आशंका से डरी हुई अँग्रेज़ सरकार ने 23 मार्च की रात्रि को ही इन क्रांति-वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी।
रात के अँधेरे में ही सतलुज के किनारे इनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।'लाहौर षड़यंत्रके मुक़दमे में भगतसिंह को फाँसी की सज़ा दी गई थी तथा केवल 24 वर्ष कीआयु में ही,23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते 'इनक़लाब ज़िदाबादके नारे लगाते हुए फाँसी के फंदे को चूम लिया।भगतसिंह युवाओं के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनगए। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे।  विद्यालय  के अंग्रेजी प्रवक्ता रविंदर कुमार मनचंदा नेकहा कि आजादी के मस्ताने वीर शहीदों का बलिदान हमें सीख देता है कि हम सब भी राष्ट्र और केवल राष्ट्रहित का कार्य करें, यही वीर बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम सब अपना कार्य ईमानदारी , समर्पण और सेवा की भावना से करें ताकि देश की खातिर मर मिटने वालों को अपनी शाहदत पर गर्व रहे।     

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