Thursday, January 11, 2018

परिवर्तन का अर्थ सिर्फ सरकार बदलना नहीं होता, हरियाणा में बदली हैं व्यवस्थायें








 The meaning of change is not just to change the government, system changes in the fast moving system in Haryana

फरीदाबाद मुकेश वशिष्ठ-abtaknews.com -11 जनवरी,2018 ; परिवर्तन, जी हां, पिछले एक अर्से से यह शब्द हरियाणा की हवा में गूंज रहा था- और वह परिवर्तन हुआ भी। 10 साल लंबे अर्से के बाद कांग्रेसियों के हाथ से सत्ता रेत की तरह खिसकी गई। ऐसा नहीं है कि रेत खिसकने का अहसास उन्हें नहीं था, पर यह शायद वे मानना नहीं चाहते थे कि मुट्ठी धीरे-धीरे खाली हुई। अक्तूबर 2014 में भाजपा पार्टी ने स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता संभाली। जिसके बाद हरियाणा में लगातार व्यवस्था परिवर्तन की बयार बह रही है। जिसका जीता-जागता नमुना चार जिलों सहित 1340 गांव को 24 घंटे बिजली देना है, जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। वह भी तब जब प्रदेश पानी और कोयला जैसे प्राकृतिक संसाधनों से महरूम है। जहां राजनैतिक पार्टियों आम जनता को बिजली बिल न भरने की नसीयत देती थी। उसी प्रदेश में पहली बार दक्षिणी हरियाणा बिजली वितरण निगम मुनाफे में आया है। 
दरअसल, मनोहर सरकार को बिजली कपंनियों के माध्यम से 30 हजार करोड़ रुपए का घाटा विरासत में मिला। इस विरासत में प्रदेश में कुंडी मार प्रथा, बिल न भरना जैसी सामाजिक बिमारी भी शामिल थी। यह वह दौर था, जहां कुंडी मारकर बिजली चोरी करना, चैधर का सिंबल माना जाता था। आंकडों पर ध्यान दे तो 31 मार्च, 2014 को ग्रामीण क्षेत्रों के 1113830 उपभोक्ता बिजली बिलों के डिफाॅल्टर थे। जबकि लाईन लाॅस 60 से 80 प्रतिशत था। ऐसे चुनौतिपूर्ण कार्य को भी मुख्यमंत्री मनोहरलाल ने अपने हाथ में लिया। बिजली विभाग को अपने अधीन रखा शुरू किया सुधारात्मक कार्य।शुरुआत में मुख्यमंत्री ने डिस्कोम सोल्यूशन के माध्यम से घाटे को खत्म करने और भविष्य में घाटा न हो इसके लिए ठोस निर्णय लिए। साथ ही कुंडी मार लोगों पर शिकंजा कसा गया। इसके फलस्वरूप आज प्रदेश में 6 फीसदी लाइन लाॅस कम हो पाया है। केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पीयूष गोयल ने भी इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री को बधाई दे चुके है। मुख्यमंत्री मनोहरलाल की अगुवाई में प्रदेश बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की तरफ बढने लगा है। 
देखा जाए तो कभी पूर्ववर्ती सरकारों ने प्रदेश के ढांचा विकास पर ध्यान नहीं दिया। हुड्डा सरकार अपने प्लांटों में बनी बिजली का इस्तेमाल करने की बजाए निजी कंपनियों से बिजली खरीदने पर जोर देती रही। यही वजह है कि पीक सीजन में भी बिजली उत्पादन के प्लांट अपनी पूरी क्षमता से नहीं चलाए जा सके। उस समय झज्जर के झाड़ली गांव में इंदिरा गांधी सुपर थर्मल पावर प्लांट में पांच-पांच सौ मेगावाट कोयले पर आधारित बिजली उत्पादन के लिए तीन यूनिट व खानपुर खुर्द के महात्मा गांधी सुपर थर्मल पावर प्लांट में 660-660 मेगावाट बिजली उत्पादन वाली दो यूनिट थी। दोनों प्लांटों से 2820 मैगावाट बिजली बनाई जा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, लोग बिजली के लिए तरसते रहे। बिजली के लिए अनेक बार लोगों को सड़कों पर उतरने को मजूबर होना पड़ा। उसके बाद भी लोगों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाई है। यह आंकड़ा और ज्यादा ऊपर हो सकता था अगर तात्कालीन केंद्रीय बिजली राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी घोषणा को लेकर संजीदगी दिखाई होती। 2013 में इंदिरा गांधी पावर प्लांट में एक समारोह के दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि यहां पांच सौ मैगावाट की एक और यूनिट लगाई जाएगी। यूनिट का लगना तो दूर हुडडा सरकार में उसकी फाईल भी आगे नहीं बढ़ सकी। कांग्रेस सरकार निजी कंपनियों से मंहगे दामों में बिजली खरीदने में रूचि दिखाती रही। दूसरी तरह सरकार ने डिफाल्टरों पर शिकंजा कसने की बजाए ईमानदार जनता को भी बेईमान बनने के लिए मजबूर किया।
विशेष बात ये भी है कि हुड्डा सरकार के दौरान बिजली डिफाल्टरों की संख्या सबसे ज्यादा रोहतक जिले की थी। जहां लोग बिजली चोरी को चौधर से जोडकर देखते है। हुड्डा सरकार ने इस गलत आदत को सुधारने की बजाए उसे बढ़ावा देनेका काम किया। जब हुड्डा सरकार ने प्रदेश में 16 सौ करोड़ बिजली के बिल माफ करने की घोषणा की थी, जिसमें से 11 सौ करोड़ तो अकेले विशेष क्षेत्र रोहतक के थे। हाल ही में बिजली निगम की ओर से सरचार्ज माफी योजना के लिए सभी गांवों पर बकाये के लिस्ट जारी की, जिसमें सभी गांवों की स्थिति सामने आ गई है। अभी भी रोहतक जिले के गांवों में रहने वाले लोग बिजली विभाग का 416 करोड़ से ज्यादा रुपया दबाए बैठे हैं। इसमें किलोई सबसे बड़ा डिफाल्टर है, जिस पर 5687 लाख रुपया बकाया है। टिटौली के लोग भी बिजली बिल नहीं भरते हैं और वह निगम के 3438 लाख रुपये के कर्जदार हैं। इनके अलावा भी काफी गांव ऐसे हैं जो एक हजार लाख रुपये से ज्यादा बिजली निगम का दबाए बैठे हैं। बिजली निगम के सब अर्बन डिविजन में पड़ने वाले सबसे ज्यादा गांवों के लोग बिल नहीं भरते हैं। इसके 82 गांवों के लोगों पर 27388.11 लाख रुपये बकाया है। इनमें सबसे ज्यादा टिटौली गांव पर 3438.92 लाख रुपया बकाया है तो खरैंटी पर 1534.49 लाख रुपया बकाया है। निंदाना पर 1524.53 लाख रुपये तो सुनारिया के लोगों पर 1425.31 लाख रुपया है। बालंद गांव भले ही छोटा हो, लेकिन वहां के लोग भी बिजली बिल बकाया में काफी ऊपर हैं और उस गांव पर 1372.51 लाख रुपया है। बहुअकबरपुर पर 1230.51 लाख रुपया है और खरखड़ा पर 1110.15 लाख रुपये का बिजली बिल है। सब अर्बन डिविजन दो में 59 गांवों पर 14187.84 लाख रुपया बिल बकाया है। हालांकि अब जिले के सभी गांवों में अधिकारी खुद जाकर लोगों को बिल जमा करने के लिए जागरूक कर रहे है। जिसका असर अब दिखाई देने लगा है।लेकिन लोग बिल जमा करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। सरकार के अथक प्रयास से लोगों में बिल भरने की प्रवृत्ति जाग्रत हुई है। साथ ही सरकार ने बकायों और हाई लाॅसिज का हल भी निकाला है। लाइन-लाॅस कम होने के कारण आज 237 फीडरों के 1340 गांव में 24 घंटे, 160 फीडरों के 656 गांव में 15 घंटे और 30 फीडरों के 81 गांव में 18 घंटे बिजली बढाई गई है। जबकि फरीदाबाद, पंचकूला, अंबाला और गुरूग्राम के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार 24 घंटे बिजली आपूर्ति दे रही है। ईमानदार जनता से मिले व्यापक सहयोग से अब सरकार प्रदेश को बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में अग्रसर है। मात्र 200 रूपये में बिजली का कनेक्शन देने की घोशणा से कुंडी मार प्रथा पर रोक लगी है। वहीं, बिजली निगमों पर बोझ कम करने और अक्षय ऊर्जा को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने 30 किलोवाट से अधिक लोड वाली इकाइयों और 500 वर्ग गज से बड़े प्लाटों में सौर ऊर्जा प्लांट लगवाना अनिवार्य कर दिया है। उपभोक्ताओं की शिकायत दूर करने के लिए आॅनलाइन पोर्टल की शुरुआत की गई है। ढांचागत सुधार के लिए 5665 किलोमीटर लंबी लाईनें और 55936 नए टांसफर्मर लगाएं गए है। भविष्य में बिजली उत्पादन क्षेत्र में सरकार की कई योजनाएं हैं, जिससे प्रदेश बिजली उत्पादन के मामले में शीघ्र ही आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि आवश्यकता से अधिक बिजली पैदा करने वाला प्रदेश होगा। सही मायने में मनोहर सरकार ने साबित किया है कि परिवर्तन का अर्थ सिर्फ सरकार बदलना नहीं होता। 

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