Wednesday, October 4, 2017

रावण जलाने पर मजा और खेतों में पराली जलाने पर सजा क्यों : शैलेंन्द्र सिंह


फरीदाबाद 4 अक्टूबर(abtaknews.com )संयुक्त आंदोलन के संयोजक शैलेन्द्र ङ्क्षसह ने कहा है कि  खेतों में पराली जलाए जाने से प्रदुषण होने का शोर मचाने वाले शहरी लोगों को रावण दहण दिखाई नहीं पडता है। जिसके समारोह का वे जोर शोर से आयोजन करते हैं। क्या रावण का पुतला जलाए जाने पर आक्सीजन निकलती है? देश में करोड़ो के पटाखे पुतले में भर दिए जाते हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति आग लगाने वाले कार्यक्रम में आगे बढकर शामिल होते हैं। हर साल रावण जलाया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत दर्ज की जाती है। हर साल बुराई को, रावण जलाकर खत्म कर देते हैं और दूसरे ही दिन फिर उन्हीं धंधो को करने में जुट जाते हैं बेशर्मी के साथ। शैलेन्द्र ङ्क्षसह ने कहा कि व्यवस्था पर पाखंडियों ने मजबूत शिकंजा कस रखा है। दिवाली के दिन पूरे देश के आसमान को बारूद के धुएं से पाट देगें। बिगडै़ल अमीर, करोड़ो कारों, मोटरवाहनों से प्रदुषण होता रहे, कोई बात नहीं है। लेकिन किसान लकडी जलाकर रोटी पकाने लगे खेत खलियान को साफ करने लगे तो शहरों में सकंट आ जाते हैं। दिवाली , दशहरा जरूरी है। दिवाली के आसमानी पटाखे जब फटते हैं तो गरीब अपनी घास फूस व प्लास्टिक की झौंपडी बचाने की जद्दोजहद में जुटा होता है। 
उन्होंने कहा कि किस बात की दिवाली दशहरा? क्या रामायण में श्रवण कुमार का वध ? एक गरीब दासी मंथरा केा लात घूसों से पीटा जाना? एक आदिवासी माहिला श्रूपणखां की नाक काटना( नाक कटना मुहावरा भी है) ? शिकायत लेकर पहुंचे उसके भाईयों खर व दूषण का वध? एक महिला अहिल्या का लातमार कर उद्धार करना? दो भाईयों की लडाई में छुपकर एक भाई बाली का वध ? जैसी बातें क्या गौर करने जैसी नहीं हैं? राम के अयोध्या से 14 साल तक बाहर रहने और इस दौरान अयोध्या में पूरी तरह शांति रहने की बात विचार करने जैसी नहीं है। 
शैलेन्द्र ङ्क्षसह ने कहा कि देश में गरीबों का क्या कसूर? इनकी हालत क्या दिखाई नहीं पडती है। प्लास्टिक की फटी पुरानी पन्नियों की झौंपडियों में गंदे नाली के किनारे बसते हैँ ये गरीब। शहर के बीचों बीच। वैसे खुले में शौच पर पाबंदी है अब। सदियों से शुद्रों, महिलाओं पर अत्याचार करने वाले, उन्हें सामाजिक व आर्थिक अधिकारों से वंचित रखने वाले, बाल विवाह, देवदासी, सति जैसी प्रथाओं का हिमायती वर्ग एक बार फिर सिर उठा रहा है। गरीबों को नरक में धकेल कर अमीर उत्सव मना रहे हैं। आज अमीरी खेल खेल रही है। उन्होंने कहा कि शहरों के बीचों बीच लाखों लोग गटर के पानी से नहाते हैं उसी में बर्तन धोते हैं, उसी के पास रहते हैं, वहीं पैदा होते हैं और वहीं पर मर जाते हैं। उन्होंने कहा कि अंतिम आदमी की खोज में लगे दिन रात नेता जी कि कहीं मिले तो उसका झट से उद्धार कर दें लेकिन उन्हें अंतिम आदमी दिखाई नहीं पड रहा है। 

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