Monday, September 25, 2017

बैल गाड़ी पर सवार होकर अशोक तंवर ने गरीब, मजदूर व किसान का अपमान किया ; शैलेन्द्र सिंह



फरीदाबाद(abtaknews.com ) संयुक्त आंदोलन के संयोजक शैलेन्द्र सिंह ने कहा है कि बैलगाड़ी को पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में पेश करने का मतलब गांव, गरीब, किसान और मजदूर का अपमान है। अक्सर मंहगाई व पेट्राल डीजल के दाम बढने के विरोध में शहरों में जब तथाकथित विकास पसंद शहरी पार्टियों के नेताओं के द्वारा विरोध प्रदर्शन किया जाता है तो अमीरों के हितैषी अमीर नेता बैलगाड़ी पर सवार होकर दर्शाते हैं कि देखो अगर ऐसा ही हाल रहा तो बैलगाड़ी पर चलना पड़ सकता है। यानि कारें नहीं चल सकेंगी। कारें विकास का प्रतीक हैं और बैलगाड़ी विनाश का। उन्होंने कहा कि इस तरह बैलगाड़ी का मजाक उडाया जाता है। उसमे गति नहीं हैं, चमक नहंी हैं, ठाठ नहीं हैं, आराम नहीं हैं। ऐसी मानसिकता वाले लोगों का तरस खाने की नहीं अपितु नफरत की जरूरत है। क्योंकि ऐसे लोग गरीब से व गरीबी से नफरत करते हैं। उन्होंने कहा कि पहले बीजेपी वाले करते थे अब कांग्रेस वाले कर कर रहे हैं। ये एक ही तो हैं।

शैलेन्द्र ङ्क्षसह ने कहा कि बैलगाड़ी रोजगार देती है। हाथ के कारीगर को। बढ़ई को। लुहार को। खेती किसानी में गरीब की मदद करती है। उस गरीब किसान की जो ट्रक्टर नहीं खरीद सकता बैलगाडी उस बैल द्वारा खींची जाती है जिसके कारण गाय को महत्व दिया जाता है। शहरों में तथाकथित विकास ने बैलगाडी के लिए मुश्किलें खडी कर दी है। उसका सडकों पर चलना मुश्किल ही नहीं असंभव कर दिया गया है। पुल बनाए गए हंै जिनसे रिक्शा व बैलगाडी पार नहीं हो सकती हैं। उन्हें सडकों से इसलिए दूर कर दिया जाता है कि उनसे जाम लगता है। कारों को गुजरने में देर हा सकती है जिनमें अमीर लोग सवार हैं। उन्होंने कहा कि सवाल यह खडा होता है कि कारों की उपयोगिता क्या है कारें किसलिए व किसके लिए जरूरी हैं। कारों के होने से किसी भी तरह का विकास व उन्नति कैसे होती है। जो वर्ग कारों का उपयोग करता हो उसका देश, समाज के निर्माण में, उन्नति मेेंं कैसा योगदान है? अगर योदान है तो कारों के बिना वह संभव नहीं है?

अस्पतालों में एम्बूलेंस की बातें छोड दे तों कारे सिवाय नुकसान के कोई लाभ करते प्रतित नहीं होती हैं। दरअसल कारों का उपयोग करने वाली जमात शारिरक श्रम से परहेज करती है। कंपनी मालिक, मैनेजर, इंजिनियर, अफसर, वकील, जज, लेखक, जमींन दलाल, बिल्डर, माफिया, सूदखोर कारों में ठाठ से घूमते हैं। ना तो ये सेना में भर्ती होते हैं और ना ही किसी प्रकार के निर्माण कार्य को दिखाई करते पडते हैं। खेत खलियान में व किसी भी तरह की मेहनत करने वाला व्यक्ति कभी कार में दिखता है। उन्होंने कहा कि कार के पक्ष में अक्सर दलील दी जाती है कि उससे सही समय पर तेजी से गंतव्य तक पहुंचने में मदद मिलती है। यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। कारखाने में काम करने वाले मजदूर, साईकिल पर, पैदल व दूसरे तरीकों से सवेरे ही सही समय पर काम पर पहुंच जाते हैं। कचहरियों में सरकारी दफ्तारों में किसी भी तरह के निर्माण के लिए खेत में खलियान में मजदूर देरी नहीं पहुंचता है जबकि कंपनी मालिक, मैनेजर, इंजिनियर, अफसर, वकील, जज, लेखक, जमींन दलाल, बिल्डर, माफिया, सूदखोर जैसे लेाग कारों में ठाठ से उस समय पहुचते हैं जब मेहनत करने वाला मजदूर सब ठीक ठाक कर चुका होता है। समय का यह अंतर घंटो का होता है। उन्होंने बताया कि कारों में जो तेल जलता है उसे विदेशों से मंगाया जाता है। देश का पैसा विदेशों में जाता है बर्बादी के लिए। प्रदुषन की तो बात ही क्या। बैलगाडी का चलन अगर बढता है तो रोजगार बढने की गांरटी है। बैलगाडी खुशहाली की गांरटी है। बैलगाडी उस भोजन को शहरों तक पहुंचाने व पैदा करने में मददगार है जिसे वह खाकर जीवन जीता है। बैलगाडी का अपमान बंद होना चाहिए। नेता किसी गरीब की बैलगाडी मांगकर लात है और प्रदर्शन करते हैं ताकि उसका अपमान किया जा सके।


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