Thursday, September 7, 2017

सतयुग दर्शन वसुन्धरा में समभाव समदृष्टि की महत्ता को जानने-समझने का विशेष कार्यक्रम


फरीदाबाद (abtaknews.com)सबकी जानकारी हेतु, एक मानव के जीवन में, समभाव-समदृष्टि की महत्ता को जानने-समझने व तदुपरान्त अमल में लाने हेतु सतयुग दर्शन ट्रस्ट द्वारा, प्रतिवर्ष दिनाँक ७ सितमबर को, समभाव दिवस के नाम से मनाया जाता है। इस शुभ दिवस दूर-दराज यानि देश-विदेश से, हज़ारों की सं2या में श्रद्धालु, ग्राम भूपानि स्थित, सतयुग दर्शन वसुन्धरा पधारते हैं। इस वर्ष भी समभाव दिवस मनाने के लिए काफी सं2या में श्रद्धालु एक दिन पूर्व ही वसुन्धरा पहुँचे हैं। श्रद्धालुओं के रहने व खाने-पीने का प्रबंध ट्रस्ट द्वारा नि:शुल्क परिसर में ही किया गया है। इस अवसर पर उपस्थित सभी सजनों का अपनी अंतरात्मा से अभिनंदन करते हुए ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने कहा कि आज  के शुभ दिवस हम सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ के अनुसार समपूर्ण मानव जाति को सद्गुण समपन्न और ईमानदारी से निष्कलंक जीवन जीने के योग्य बनने हेतु, समभाव नजऱों में कर व सजन वृत्ति पकड़ समचर अर्थात् सदा एक सा आचरण व व्यवहार करने वाला बनने का आग्रह करते हैं।

इस संदर्भ में समभाव के विषय में स्पष्ट करते हुए उन्होने कहा कि समभाव मनुष्य की समान प्रकृति व भाव है। यही समता व समरसता है। इसके अंतर्गत भावों या विचारों की एकता हो जाती है। यह सामंजस्य या मेल भाव का द्योतक है। इसे ही सजनता, सुगमता, सरलता, ईमानदारी व स्पष्टवादिता का व्यावहारिक आधार माना जाता है। आशय यह है कि मन, वचन, शरीर और बुद्धि प्रवृक्त हो या निवृक्त -- सबमें समान भाव रखना ही समभाव है, समता है। यह मानवता के बाह्र विभेद को अंदर से पाटने वाली आत्मिक अनुभूति है। तभी तो कहा गया है कि अनंत चेतना में एकीभाव तथा सब को समभाव से देखने वाला निर्विकारी सजन सीधे स्वभाव वाला होता है तथा आत्मा को समपूर्ण जगत में स्थित और समस्त जगत को आत्मा में स्थित देखता हुआ, समस्त जीवों को समभाव से स्वीकारता है। उनके अनुसार समभाव आने पर मन निद्र्वन्द्व हो जाता है। जड़-चेतन समरस हो जाते हैं, चेतना एक परमेश्वर की ओर उन्मुख हो जाती है और आनन्द अखंड और सघन हो जाता है। श्री सजन जी ने कहा कि जो समग्र विश्व के प्रति, समभाव का नज़रिया रखता है, वह न किसी को प्रिय समझता है, न अप्रिय। ऐसा समदृष्ट तो, अपने-पराए की भेद-बुद्धि, व द्वन्द्वों से परे हो, अथार्त, समस्त 1लेशों, पापों व संघर्षों से छुटकारा पा, सर्वथा निराकुल व शांत हो जाता है। इस प्रकार समभाव की साधना को, परिपक्व तभी माना जाता है, जब समग्र विश्व, एकरूपता से दिखाई देता है और मानव सबसे आत्मवत् व्यवहार कर सजनता का प्रतीक बन जाता है। ऐसा होने पर मन समभाव में स्थित हो जाता है और मानव  जीते-जी ही हर शै में, परब्राहृ परमेश्वर का अनुभव कर, संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है।
उन्होंने कहा कि आत्मोथान के निमित्त समभाव-समदृष्टि की इसी महत्ता को समझते हुए सजनों ममत्व बुद्धि से रहित होकर, सम-भाव अनुरूप जीने की पद्धति को ही अपनाओ, 1योंकि, इससे भिन्न जीवन शैली अपनाने पर यानि द्वि-द्वेष से युक्त अन्य व्यभिचारी भाव अपनाने पर, न तो जगत की, और न ही जीवन की सार्थकता को प्राप्त कर पाओगे। यही अभाव फिर मनगढ़ंत व हानिकारक अज्ञानमय विचारधारा को, अपनाने का हेतु बनेगा। इस तरह सकारात्मक भाव-स्वभाव अपनाने के स्थान पर नकारात्मक भाव-स्वभाव अपनाने से जीवन का सारा खेल बिगड़ जाएगा और जन्म की बाज़ी हार जाओगे। यह जानने हेतु समझो कि च्भावज् की एक मानव के जीवन में अतुलनीय भूमिका है। भाव ही एक मानव के आचरण का मूल व भाग्य निर्माता है। ऐसा इसलिए 1योंकि भाव ही भावना में, भावना ही संकल्प यानि निश्चित मत/विचार में, निश्चित मत/विचार ही करनी में, करनी ही प्रकृति यानि स्वभाव में, प्रकृति यानि स्वभाव ही चरित्र में और चरित्र ही प्रार4ध/भाग्य में रूपांतरित होता है। इसी रूपांतरण के आधार पर ही एक मानव श्रेष्ठ या अधम पुरूष बन सदाचारी या दुराचारी कहलाता है। ज्ञात हो कि किसी विशिष्ट भाव के प्रति हमारा झुकाव होने से वह भाव, भावना के रूप में हमारे    चित्त में दृढ़ होता जाता है। यहाँ स्पष्ट कर दें कि भावना चित्त का एक संस्कार है जो अनुभव तथा स्मृति से उत्पन्न होता है। याद रखो मानव का जैसा भाव होता है, वैसी ही उसकी भावना भी होती है। यदि भाव, समभाव/ब्राहृ भाव आधारित होता है तो भावना ब्राहृ संबंधी होती है व मानव की वृत्ति -स्मृति, बुद्धि व स्वभावों का ताना-बाना निर्मल बना रहता है और यदि भाव समल यानि कलुषित होता है, तो भावना भी विषयवासना युक्त हो जाती है। परिणामस्वरूप वृत्ति -स्मृति, बुद्धि व स्वभावों का ताना-बाना भी मलिन हो जाता है। याद रखो मनुष्य भावना अनुरूप ही हर काम करता है। अपनी भावना अनुसार ही वह कर्म त्त्व से बंधन में फँसता है तथा उसी भावना की विशुद्धता व निष्कामता द्वारा वह अपने जीवन के परम पुरुषार्थ को सिद्ध कर लेता है। इस तथ्य से समभाव को नजऱों में करने की महत्ता का औचित्य भली-भांति स्पष्ट हो जाता है। इसलिए सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ में कहा गया है


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