Wednesday, September 27, 2017

डीएवी कॉलेज में राष्ट्रीय चेतना शक्ति संस्थापन फरीदाबाद द्वारा एक विचारगोष्ठी का आयोजन


फरीदाबाद 27सितंबर ,2017(abtaknews.com ) ; राष्ट्रीय चेतना शक्ति संस्थापन फरीदाबाद द्वारा एक विचारगोष्ठी का आयोजन, डी. ए. वी. षताब्दी काॅलेज, फरीदाबाद  के प्रांगण में, प्र्रातः 11 बजे से 2 बजे दोपहर तक किया गया, जिसका षीर्षक था, साहित्य का नैतिक मूल्यों के विकास में महत्व’’ डा. हरजीत एस. आनन्द आई. ए. एस. (सेवा निवृत) पूर्व सचिव भारत सरकार, ‘चेयरमेन ग्लोनेट नोलेज सर्विसिज नई दिल्ली इस समारोह के मुख्य अतिथि थे जिन्होनें उपर्युक्त विषय पर अपना विद्वतापूर्ण की नोट एड्रेस प्रस्तुत किया। डा सुखबीर सिंह आई. ए. एस. (सेवा निवृत) अध्यक्ष राष्ट्रीय चेतनाषाक्ति संस्थापन फरीदाबाद ने  अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया था विचारगोष्ठी के विषय को विकसित किया एवं उभारा। डा. सतीष आहूजा प्राचार्य डी. ए. वी. षताब्दी काॅलेज, फरीदाबाद ने समारोह की अध्यक्ष्ता की और अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी प्रस्तुत की।  प्रो. (डा.) दिव्या त्रिपाठी विभागाध्यक्ष संस्कृत डी. ए. वी. शताब्दी काॅलेज, फरीदाबाद ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।   लगभग 20 विषिष्ट व्यक्तियों तथा काॅलेज के लगभग 80 विद्यार्थियों, कुल  लगभग 100 व्यक्तियों ने इस समारोह में भाग लिया।

इस विचारगोष्ठी में जो बिन्दु विषेष रूप से उभरकर सामने आये उन का सार निम्न प्रकार से है
काफी समय से साईस और बिजनिस मेन्जमेन्ट के विषयों को साहित्य एवं उदारवादी कला की पढ़ाई के मुकाबले बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है इस पक्षपात पर षीघ्र पुनर्विचार कर एवं इस असंतुलन को सही करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवष्यकता है क्योकि साहित्य एवं उदारवादी कला की षिक्षा सभ्यता के एवं संस्क्ृति एवं सभ्यता को बचाये रखने के लिए बहुत जरूरी है। अतः यह अनिवार्य है कि विष्वविद्यालयों में दीवारें न खिची हो और वहां ‘आटर्स तथा साईंस’ साथ साथ फल फूल सकें। ‘साहित्य एवं  उदारवादी’, ‘कला एवं आर्टस’ की षिक्षा व्यक्ति एवं देष के विकास के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी की साईंस की षिक्षा। व्यक्तियों एवं समाज में नैतिक मूल्यों के विकास के लिए साहित्य एवं उदारवादी कलाओ एवं आर्टस की षिक्षा का बहुत महत्व है। मौजूदा षिक्षा प्रणली में हम अच्छे वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर आदि तो बना रहे है परंतु यह जन संसाधन चरित्रवान दक्ष,ईमानदार व देषभक्त है यह बात सुनिष्चित नहीं की जा रही है। अब हम नैतिक मनुष्य की बजाए  व्यपारिक मनुश्य का विकास कर रहे है। एक नैतिक व्यक्ति सम्पूर्ण व्यापक होता है जबकि एक व्यापरिक व्यक्ति एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसका जीवन में एक सकुंचित ध्येय होता है - धनार्जन का वह समेचित एवं सम्पूर्ण व्यक्ति नही होता है जैसा गुरु रविन्द्र नाथ टेगोर ने अपनी पुस्तक ‘राश्टवाद’ में लिखा है। इस प्रक्रिया से साइंस का विकास बहुत बडे पैमाने पर हुआ है और इतना षक्तिषाली हो गई है कि इससे मानव नैतिकता का संतुलन बिगड गया है और उसके मानव पक्ष को इस संस्थापन ने ग्रहण लगा दिया है।

मारथा सी. नूस्सबोस ने एक पुस्तक लिखी है जिसका षीर्शक हैः नोट फोर प्रोफिट वाई डेमोक्रेसी नीडस दी हयूमेनिटिंज, इस पुस्तक  की समीक्षा षैली वालिया द्वारा ‘फरन्टलाइन’ मार्च 3, 2017 के पृश्ठ 94 तथा 95 पर की गई है जिसका टाइटल हैः दी क्रासिंस इन हियुमिनिटिज, जिप का सार है कि ‘षैक्षिक जगत को नैगम नेतृत्व एवं स्वार्थ के चुगल से आजाद कराया जाए और उदारवादी कला एवं लिबरल आर्टस के विरुद चल रहे भेदभाव को मिटाया जाए जोकि सभ्यता के स्वास्थ के लिए कितना जरुरी है।

लैगम नेतृत्व कोरपोरेड हजिमोनी ने स्वार्थ के लिए विष्वविद्यालयों का आर्थिक प्रबन्धन का नियन्त्रण अपने हाथों में लेकर उन्हे आर्थिक सहायता दे कर वहा की षैक्षिक नितियों को इस प्रकार से प्रभावित किया है कि साहित्य एवं मानविका अर्थात उदारवादी कलाओं के क्षेत्र को दूसरे दर्जे की श्रेणी में धकेल दिया है। इस प्रकार विष्वविद्यालयों की नीतियां कोरपोरेट एजेन्डा ‘अर्थात नैगम कार्यसूचित के अनुसार बनाई जा रही है। यह प्रक्रिया भारत में ही नहीं पूरे विष्व में विषेशकर प्रगतिषील देषों जिससे यू.एस.ए. भी षामिल है में अपनाई जा रही है। केवल अर्थिक प्रगति ही अच्छे जीवन जीने का पैमाना नहीं है। साहित्य का एक तरफ कर के प्रजातंत्र सस्थाओं को जोखिम में डाला जा रहा है। उदारवादी कला की पढाई एवं उपाधि आर्थिक सिद्वान्तो से आग जा कर इतिहास राजनीति आदि क्षेत्रों में जा कर समकालीन समाजो को आकृति देती है। गलोबल एवं सार्वभौम नागरिकता तो पूर्णतया हियूमेनिटीज एवं उदारवादी कला पर ही निर्भर है जिस के बिना हम अपने आप को जोखिम में डाल रहे है।

‘हियूमेनिटीज के बचाव में यह कहा जा सकता है कि इससे विचारो धारणाओं, एवं असहमति अन्याय के विरोध के प्रति वचन बद्वता आती है जिससे षिक्षा उच्चतर स्तर पर पहुच सकती है। उदारवादी कला तथा साहित्य के बल पर ही विष्वविद्यालय आर्थिक सामाजिक तरकी और सस्ंकृति की रखवाली करती रही है। इस से ऐसे षिक्षितों में सत्ता के सामने सत्य बोलने की क्षमता उत्पन्न होती है।

प्रजांतत्र को हिमेनियटीज साहित्य इसलिए चाहिए क्योकि इस से सामाजिक उत्तदायित्व के लिए वचनबद्वता आती है। आदि में काल से कला एं साहित्य की पढाई षिक्षा का अभिन अंग माना जाता रहा है क्योकि ऐसी षिक्षा एक स्वतंत्र एवं क्रियाषील व्यक्ति के लिए अनिवार्य है जो एक क्रियाषील नागरिक का जीवन व्यतीत कर सके और अपने विष्लेशणात्मक रुख से समस्याओं का समाधान कर सके और आने वाले सभी चुनौतिया का मुकाबला कर सके।

शिक्षाविदों पर छोड दिया जाए कि  वह शिक्षा  की व्यवस्था अच्छे से अच्छे ढंग से कर सके। उन्हे उन के मन, बुद्वि तथा विचारो की गुणवता से आका जाना चाहिए न कि उनके राजनैतिक सम्बन्धों अथवा उनके विचारिक मुकासो से।

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