Thursday, June 8, 2017

नारों के बीच, अभाव भरे बचपन से जूझती म्याहरी लाड़ो


फरीदाबाद-08 जून, 2017(abtaknews.com)कमजोर कंधो पर जब ढेर सारी जिम्मेवारी और फौलादी हौंसले से लबरेज करिश्मा पढऩे का तैयार है। कभी स्कूल नही गई लेकिन अपना नाम हिंदी व अंगेजी दोनो में लिख लेती है। मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव से अपने मातापिता जगदीश व कमला के साथ रोजी रोटी की तलाश में हरियाणा आ पहुंचे। दिल्ली एनसीआर क्षेत्र के फरीदाबाद में सेक्टर 8 में बाई पास रोड़ के किनारे झोंपड़ी के साथ डेरा डाल दिया। इस झौंपडी को भी आए दिन जिला प्रशासन की कार्रवाई के दौरान तहस नहस कर दिया जाता है। आश्यिाने और रोजी रोटी की जुस्तजूं में पढऩे लिखने की तो ये परिवार सोच ही नही पा रहा था।
भारत सरकार द्वारा बाल श्रमिकों एवं स्कूल बीच में ही छोड़ देने वालों के लिए किए जा रहे सर्वेक्षण में उक्त बालिका श्रमिक अपनी झौंपडी के बाहर चिलचिलाती धूप में चूल्हा फूंकतें हुए मिली जिससें अबतक न्यूज पोर्टल टीम ने बात की तो उक्त बाते पता चलीं। मात्र 12 साल की उम्र में 1200 रूपये मासिक पगार पर करिश्मा सेक्टर में घरेलू नौकरानी का काम करती है उसके अलावा अपने मजदूर मां-बाप के काम पर चले जाने के बाद घर का सारा काम करना और अपने छोटे भाई-बहन की जिम्मेवारी भी उसी की रहती है।
करिश्मा स्वयं भी पढना चाहती है और अपने छोटे भाई-बहन को भी पढ़ाना चाहती है। भरी दोपहरी में अपने छोटे भाई-बहनों और माता पिता के लिए चूल्हे पर खाना बनाती करिश्मा की बेबसी सत्तारूढ प्रदेश व देश की सरकारों द्वारा चलाई जा रही तमाम तरह की योजनाओं एवं परियोजनाओं की हकीकत की पोल खोलती दिखाई दे रही है। इस बस्ती में ज्यादातर के पास बैंक अकाउंट और आधार कार्ड तक नही हैं। आधे से ज्यादा लोगों के पास मोबाईल भी नही हैं। सर्वे टीम को अपने सामने देख कर करिश्मा की बेजान से आंखों की चमक बढ गई और उसने तुरंत टीम को अपना और अपने भाई बहन का नाम पढने के लिए लिखवा दिया। देश की मुख्यधारा और विकास की मुहिम में उक्त परिवारों को कैसे और कब तक जोडा जाएगा इसके लिए कोई ठोस पहल होनी चाहिए।


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