Thursday, April 6, 2017

सतयुग दर्शन वसुंधरा में राम नवमी यज्ञ महोत्सव


फरीदाबाद (abtaknews.com) 06 अप्रैल,2017 ; रामनवमी की पवित्र बेला पर आज सतयुग दर्शन वसुंधरा के प्रांगण में हवन आयोजन के उपरांत कई नवजात शिशुओं ने चोले डलवाए, उनका नामकरण हुआ व मुण्डन संस्कार समपन्न हुआ। आज सफ़ेद पोशाक व गुलानारी दुपट्टा धारे श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ थी। आज यहाँ अनमोल मानव जीवन के परमपद को समयानुसार प्राप्त कर लेने की महत्ता पर बल देते हुए ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने समय की अमूल्यता के विषय में बताते हुए कहा कि:- समय तो समय है, चलता ही रहता।  हर शै का रंग-रूप, बदलता ही रहता।

सुनो ध्यान देकर, समय 1या है कहता।  मेरे संग चले जो, आनंद में है रहता।।
अर्थात् काल की गति निर्बाध है, उसकी धारा सतत् प्रवाहमान है। वहाँ सर्वत्र निरंतरता है। खंडबोध नहीं है। इस काल को तीन खंडों में बाँटा गया है- भूत, वर्तमान और भविष्य। याद रखो न भूत की सत्ता होती है, न भविष्य की। जब तक घड़ी देखकर समय का बोध करते हैं, कुछ सैकेंड बीत जाते हैं। देखते-देखते वर्तमान, अतीत की गाल में समा जाता है। वस्तुत: उस वर्तमान को पल भर निहार भी नहीं पाते कि वह अतीत बन जाता है, जो क्षण भर पहले भविष्य की गर्भ में था, वह उछलकर कैसे वर्तमान बन गया और अतीत में समा गया----इसे समझना है। इस हेतु क्षण-क्षण रेत कण के समान मु_ी से फिसलते वर्तमान को सहेजना होगा 1योंकि वर्तमान ही जीवन है और यही हमारे विकास का मूलमंत्र है। इस वर्तमान को सफल बनाने का एक ही उपाय है और वह है सतत् जागरण, अत: जागते रहो, सचेत रहो ताकि कोई अपने में उलझा कर पथ-भ्रष्ट न कर दे। उन्होने कहा कि जिसका ख़्याल अचेतन हो सोचों में चला जाता है उसके अन्दर भूत की स्मृतियाँ जाग जाती हैं। परिणामत:वैर-विरोध, तेरी-मेरी, अपने-पराये का वर्ताव शुरू हो जाता है जो समभाव के विपरीत होता है। इसके विपरीत जो सर्वदा जागरूक है वही पूर्णत: विकसित हो विजयी हो सकता है और वही इस अज्ञान, अंधकार व पाप के प्रतीक कलियुग में रहता हुआ भी सतयुग का प्रतीक बन सकता है।

इस प्रकार श्री सजन जी ने समय के परिवर्तनशीलता के गुण से सजनों को अवगत कराते हुए समझाया कि जीवन के हर क्षण का बुद्धिमत्ता से प्रयोग करने की कला सीखो 1योंकि प्रत्येक क्षण भाग्य निर्माता है, वह भाग्य जो प्रार4ध में तबदील हो रहा है। इस प्रकार एक क्षण के महत्व को भी नकारना अपने भाग्य को ठुकराना है। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए, प्रत्येक मानव के लिए यथा समय अपने जीवन लक्ष्य को पाने के लिए प्रत्येक क्षण को वास्तविक रूप से जीना उसका हिसाब रखना, उस पर नियंत्रण रखना व उसी अनुरूप अनुशासित ढंग से कार्य करना अनिवार्य है। सजन जी ने कहा कि यह न हो कि हर क्षण व्यतीत होने के साथ, जीवन लक्ष्य अर्थात् परमपद को पाए बिना ही आपकी जीवनयात्रा का दु:खद अंत हो जाए इसलिए यथा समय अपने निज धर्म को पहचानकर तदनुकूल आचरण करना आरमभ कर दो व ऐसा ही अपने परिवारजनों से करवानाभी आरमभ कर दो। तात्पर्य यह है कि युग परिवर्तन के इस महत्वपूर्ण संक्रमण काल में आने वाले युग विशेष अर्थात् सतयुग की प्रवृत्ति यानि युग चेतना को धारण कर तद्नुरूप अपनी चाल या व्यवहार को ढालो, तभी युगधर्मी कहला सकोगे।


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