Monday, April 10, 2017

विद्यादान, परमदान है - डॉ0 सत्यनारायण दास


फरीदाबाद(abtaknews.com) 21बी स्थित जीवा शिक्षण संस्थान में डायरेक्टर डॉ0 सत्यनारायण दास जी ने विद्यालय प्रांगण में आत्मिक ज्ञान बाँटते हुए सभी को संबोधित किया एवं कहा कि संसार में विद्या दान परम दान है।  इसी महादान से उच्च कोटि के मनुष्य निर्मित होते हैं जो भविष्य में एक अच्छे समाज का निर्माण करते हैं। इसी विषय पर चर्चा करते हुए डॉ0 सत्यनारायण दास ने कहा कि एक अध्यापक के द्वारा किया गया विद्यादान बच्चों के लिए सदैव अंतहीन एवं अमूल्य होता है इसलिए अध्यापक को आचार्य बनना चाहिए, आचार्य अर्थात उच्च आचरण धारण करने वाला। समाज में अध्यापक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक अध्यापक का आचरण गरिमामयी होना चाहिए जिसे देखकर छात्र भी आचार्य के आचरण में ढल कर उच्च चरित्र का निर्माण करें। आज यदि हम चारों ओर दृष्टिïपात करें तो हम पायेंगे कि हमारे समाज में चरित्र व आचरण की समस्या ही सबसे अधिक है और उसका मुख्य कारण है अनुशासनहीनता। समाज में हमारे लिए सबसे आवश्यक तत्व है अनुशासन। इस विषय को और अधिक गहनतापूर्वक समझाने के लिए उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हम मनुष्यों और पशुओं में क्या अंतर है। एक आधारभूत अंतर स्पष्टï करते हुए उन्होंने कहा कि हम मनुष्य अनुशासित जीवन व्यतीत करते हैं और पशु अनुशासन के महत्व के विषय से अनभिज्ञ होते हैं। उन्होंने अनुशासन के विषय में विस्तारपूर्वक समझाया एवं अनुशासन के महत्व के विषय में बताया।
छात्र जीवन में अनुशासन का पालन करने वाला बच्चा भविष्य में उज्ज्वल मार्ग की ओर प्रशस्त होता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि एक बालक अनुशासन अर्थात आचरण का पहला सोपान अपनी माता से ही सीखता है। अत: एक बच्चे के लिए उसकी माता ही सबसे पहली गुरू होती है और एक माँ नि:स्वार्थ भाव से अपने धर्म का पालन करते हुए अपने बालक में आचरण और संस्कार का समावेश करती है। उसके उपरांत पिता की भूमिका भी एक बालक के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी की एक माता की। पिता का आचरण भी एक बच्चे पर समान रूप से कार्य करता है परन्तु सबसे अधिक प्रभावशाली भूमिका होती है एक अध्यापक की। हमें आचार्य बन कर अध्यापनका कार्य करना चाहिए।
डॉ0 सत्यनारायण दास जी के अनुसार बच्चों में स्वाभाविक रूप से उत्पात करने की प्रवृत्ति होती है परन्तु यह एक अध्यापक का कत्र्तव्य है कि उस प्रवृत्ति को परिवत्र्तित करें और उसे स्वाभाविक मनुष्य बनाये जिससे कि उसमें सैद्घान्तिक मूल्यों का विकास हो सके और वे जीवन के वास्तविक नीतियों को समझ सकें इसलिए अध्यापक को आदर्श रूप में स्वयं को प्रदर्शित करना चाहिए। एक आदर्श अध्यापक ही आदर्श समाज की स्थापना कर सकता है और सच्चा मानव कहलाता है। जीवा का यही उद्ïदेश्य है इसलिए जीवा का निर्माण हुआ।


loading...
SHARE THIS

0 comments: