Thursday, October 6, 2016

आखिर किस दम पर फूल रहे अखिलेश !


लखनऊ(संदीप पाल )(abtaknews.com )ऐसे समय में जब समाजवादी पार्टी में फैला मर्ज लाइलाज हो चुका है, मुख्यमंत्री गर्व से कह रहे हैं-सपा में सीएम का चेहरा तो मैं ही हूं। मंगलावार को कानपुर में मेट्रो प्रोजेक्ट के उद्घाटन मौके पर पत्रकारों ने सवाल दागा। जब नेताजी सब फैसले पलट रहे हैं, तब सीएम चेहरा क्यों नहीं बदल सकते? अखिलेश आत्मविश्वास से बोले- ऐसा नहीं होगा। आखिर, इस आत्मबल की वजह क्या है? वह भी तब जब मुलायम और अखिलेश के रिश्ते और ज्यादा तल्ख होते जा रहे हैं। सोमवार को लखनऊ में लोक भवन के उद्घाटन के समय बाप-बेटे में दूरियां साफ दिखीं। लोकभवन, कोपभवन बन गया। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव रूठ गए। वजह, मुख्यमंत्री अखिलेश। नई इमारत में पुराने रंग में झगड़ा। अखिलेश समय से नहीं पहुंचे। उन्हें फीता काटना था। पिता मुलायम पहले से मौजूद थे। उनसे आग्रह किया गया चे कैंची पकड़ें। पंडित ने मनाया। मुर्हूत की दुइाई दी। मगर वे नहीं माने। दो कोशिशें बेकार गईं। मंत्री आजम खान ने मामले की गंभीरता को समझा। उन्होंने धीरे से कान में कुछ कहा। तब नेताजी ने कैंची पकड़ी। इस बीच मुख्यमंत्री भी आ गए। 

प्रमुख सचिव अनीता सिंह ने कैंची पकड़ाई। इसके बाद अखिलेश की मदद से मुलायम ने फीता काटा। उद्घाटन समारोह फीका हो चुका था। मुलायम सिंह चले गए। लेकिन, बात यही खत्म नहीं हुई। थोड़ी देर में मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेस होती है। अपराधियों को टिकट बांटने के सवाल पर जवाब देते हैं-हमने सारे अधिकार छोड़ दिए। वे खफा थे। चाचा शिवपाल ने सुबह-सुबह उनके कई चेहतों के विधानसभा टिकट काट दिए थे। मुख्यमंत्री अपनी रौ में बोलते गए-ताश के खेल में जीत उसी की होती है जिसके पास तुरूप के ज्यादा पत्ते होते हैं। कहा- अभी बहुत वक्त बाकी है और यह वक्त ही बताएगा कि किसके पास कितने तुरूप के पत्ते हैं। बगल में बैठे आजम खान ने एक बार फिर स्थिति संभालने की कोशिश। मुख्यमंत्री का हाथ धीमे से दबाया। कुछ फुसफुसाए। सीएम ने मुस्करा कर कहा-सच बोलना नहीं छोड़ सकता। रामगोपाल इसके बाद किसी अन्य कार्यक्रम में लीपापोती की कोशिश की। कहा-टिकट बंटवारे में मुख्यमंत्री की कोई भूमिका नहीं होती और टिकट उनसे पूछ कर भी नहीं दिए जाते। लेकिन सवाल तो उठ ही रहा है। आखिर सीएम को टिकट बंटवारे की बैठक में क्यों नहीं बुलाया गया। जबकि वह संसदीय बोर्ड के तथाकथित मुखिया हैं।
चाचा, पिता और पार्टी में खींचतान व कड़वाहट तो यही बताती है कि समाजवादी पार्टी की खेमेबन्दी घटने के बजाय बढ़ रही है। चाचा शिवपाल ने भतीजे अखिलेश की युवा ब्रिगेड के जिन सदस्यों को पार्टी से निकाल दिया था, उन सबने अखिलेश की ही शह पर अपना नया घर ढूंढ़ लिया है। वे अब जनेश्वर मिश्र स्मारक संस्थान में बैठेंगे। वहीं से अखिलेश के समर्थन में नया वार रूम संचालित होगा। पार्टी दफ्तर से चंद कदम दूर वे अपने नेता की इमेज बिल्ंिडग के लिए काम करेंगे।

अखिलेश सार्वजनिक रूप से कहते हैं- घमासान सिर्फ पारिवारिक फील्ड में हैं, चुनावी फील्ड में सब ठीक है। सपा एकजुट है। तो संशय होता है। जब मोर्चा आमने सामने है। पिता-पुत्र मे ठनी है। तब आखिर किस तुरूप के पत्ते से अखिलेश जनता का मूड जीतेंगे? सबसे बड़ा सवाल यही है। विकास के पहिए को वे तेजी से दौड़ा रहे हैं। बेशक पिछले चार सालों में सपा सरकार ने विकास के नए आयाम स्थापित किए हैं। यदि अखिलेश के दंभ की वजह प्रदेश का विकास है तो अभी इसका इम्तहान होना बाकी है। बहरहाल, अखिलेश को चाहिए कि वह घर के झगड़े को निपटाकर उप्र की जातिवादी राजनीति के अखाड़े में विकासवादी राजनीति का अध्याय लिखें।

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