Thursday, September 29, 2016

सरकारी स्कूलों को छोड खुले आसमान के नीचे पढ रहे हैं बच्चे


फरीदाबाद 29 सितंबर(abtaknews.com) अगर मन में लग्र हो और कुछ करने का जज्बा हो तो फिर खुले आसमान के नीचे रेलवे लाइन के साथ भी शिक्षा को ग्रहण किया जा सकता है। सरकार केवल सरकारी स्कूलों में जहां अध्यापकों पर मोटे वेतन और दूसरे कार्यो के लिए खर्च करती है और बड़े-बड़े स्कूल सुविधाओं व उच्च शिक्षा के नाम पर अपनी जेबे गर्म कर रहे, वहीं एक संस्था बिना किसी लालच के ऐसे बच्चों को शिक्षित करके समाज की मुख्य धारा में जोड रही है, जो न तो सरकारी स्कूल में पढ़ सकते है और न ही निजी स्कूलों का रूख कर सकते है। बल्कि माहौल और पढ़ाई को देखते हुए कई बच्चे तो सरकारी स्कूलों को छोडकर भी इस संस्था के बेनरतले पढक़र अपने जीवन को सुधार रहे है। कई तो ऐसे बच्चे नौकरी भी प्राप्त कर चुके है और कई उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे है। 

शिक्षा के नाम पर भारी भरकम बजट खर्च करके जो काम सरकार भी नहीं कर पा रही है, वह कार्य प्रकाशदीप नामक संस्था कर रही है। बढखल पुल के नीचे ग्रिन बेल्ट में खुले आसमान के नीचे यह संस्था 60 से अधिक ऐसे बच्चो को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार भी दे रही है, जो झुग्गी बस्ती के है और उनके परिजन काम की तलाश में कभी यहां तो कभी वहां जाते रहते है। उनके पास अपने बच्चो को सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए कोई ऐसा प्रमाण नहीं है कि वे कहां के स्थाई निवासी है। इसके अलावा सरकारी स्कूलों की शिक्षा को छोडकर भी कुछ बच्चे यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे है। दिखाई दे रहे ये बच्चे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पेंटिंग व दूसरे कार्य भी यहां सिखते है। उन्हे बताया जाता है कि वे कैसे एक-दूसरे के साथ मिलकर रहे और बढ़ों का सम्मान करें। उन्हे शिक्षा देने वाली अध्यापक निशुल्क कार्य करती है, बल्कि बच्चों के लिए पाठ्य सामग्री भी उपलब्ध कराती है। खुश दिखाई दे रहे इन बच्चों की मुश्कान बता रही है कि वे यहां कितने खुश है। पढ़ाई के लिए बड़ी इमारते और भवन व सुविधाएं उनके लिए बाधक नहीं है। सरकारी स्कूलों में या तो पढ़ाई होती नहीं है या फिर सुविधाओं का नितांत अभाव है। बडे व प्राइवेट स्कूलों में भारी भरकम फीस के चलते ये बच्चे जा नहीं पाते है। कहते है कि प्रतीभा किसी की मोहताज नहीं होती। सडक़ व खुले में पढऩे वाले बच्चे भी बड़े स्कूलों के बच्चों से अधिक प्रतिभाशाली बन सकते है, संस्था इसी कार्य के उद्ेश्य को साकार बनाने में लगी है। 

कहने को तो सरकार ने यहां प्राइमरी से लेकर सैकडंरी स्कूल तक काफी खोल रखे है। कई भवनो पर दूसरे सरकारी कार्यालयों का कब्जा भी है। पुलिस आयुक्त का कार्यालय भी ऐसे ही भवन में चल रहा है, जो स्कूल के लिए बनाया गया था। लेकिन पुलिस तो पुलिस है, इसे कोन खाली करायें। खुले आसमान के नीचे पढऩे वाले बच्चों की माने तो वे यहां बहुत खुश है और यहां सरकारी स्कूलों से कहीं बेहतर पढ़ाई होती है। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हे जीवन में काम आने वाली दूसरे चीजे भी सिखाई जा रही है। वहीं इन बच्चों को शिक्षा और संस्कार देने वाली अध्यापकों का कहना है कि उन्हे सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती है। वे यहां उन्हे कोई प्रमाण पत्र भी नहीं दे सकते है। लेकिन शिक्षित होने पर वे बच्चों को दसवीं व 12वीं ओपन स्कूल से कराते है। उनकी संस्था 12 साल से कार्य कर रही है। यहां अभी उन्हे मात्र तीन माह ही हुए है। बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ कम्पयूटर ज्ञान व संस्कार भी दिए जा रहे है। फरीदाबाद में इस तरह के उनके तीन अस्थाई स्कूल है, जो झुग्गी में रहने वाले बच्चो को पढ़ाते है। प्रतीभा किसी धन व सुविधा की मोहताज नहीं है। बडे स्कूलों के बच्चे भी कई बार वे नहीं कर पाते है जो ये बच्चे टापर बनकर कर दिखाते है। 

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