Sunday, September 11, 2016

जब बच्चों का पढने में न लागे मन.........



फरीदाबाद-सितंबर 11 ,2016(abtaknews.com ) दोस्तों आज हर बच्चे को एक बहुत बडी उलझन से दो दो हाथ करना पडता है।क्या है वह उलझन जानना चाहेंगे ??? जी क्या कहा आपने ?? हाँ तो सुनिए वह उलझन बच्चो की पढाई सें जुडी हुई है। जी हाँ आज हर बच्चा पढाई से जी चुराता है आखिर क्यों ??? कभी सोचा आपने ??? नही तो एक बार सोचिए । आखिर आपके बच्चे का मन पढाई में क्यों नही लगता ?? कही इसके लिए आप तो जिम्मेदार नही ? या उसके दोस्त ? या फिर वह स्वयं ?

कही माँ बाप ही तो जिम्मेदार नही हैं ??अरे आप तो नाराज हो गये---मै (आर्यवीर लायन विकास मित्तल) आपको इसके लिए दोषी नही मान रहा हूँ। आप माने या न माने कई बार जाने अन्जाने आप से कुछ गलती हो जाती है। माँ बाप अपने बच्चों की योग्यता पहचाने बिना ही अपनी अधूरी इच्छा पुरी करने का जरिया बनाते है। माँ बाप अपने बच्चों को उनकी इच्छा के बजाय अपनी इच्छा के अनुसार विषयों का चयन करवाते है। जिससे बच्चें का मन पढाई से उचट जाता है। अगर आप चाहते है कि आपका बच्चा पढ लिख कर एक बहुत बडा व्यक्ति बने तो उसको उसकी योग्यतानुसार विषय चुनने की आजादी दें ताकि वह अपनी क्षमता का सदुपयोग करके अपनी मन्जिल हासिल कर सके। साथ ही साथ उसको अपनी पसन्द के क्षेत्र में आगे बढने के लिए प्रोत्साहित करते रहे है। जिससे वह अपनी मन्जिल को आसानी से हासिल करके उज्जवल भविष्य की तरफ अग्रसर होगा और साथ ही साथ उसके मन में आपके लिए (माँ बाप ) के लिए और ज्यादा इज्जत बढ जाएगी ।

एक बात और आज हर माँ बाप अपने बच्चें की हर अच्छी बुरी फरमाइश को तुरन्त पुरा कर देते है। जिससे उसको इस बात अहसास ही नही होता है उसकी फरमाइश को पुरा करने के लिए उसके माँ बाप को कितनी मेहनत करनी पडती है। यहा तक की उसको पैसे की कीमत का भी अहसास भी नही होता। माँ बाप को चाहिए कि वह बच्चे की आवश्यक जरूरतों को तो पूरा करे परन्तु  नाजायज मांगों को पुरा न करे और उसको बेहतर भविष्य के लिए पैसे के महत्व के बारे में भी समझाए।

एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है कई बार बच्चे को गलती की वजह सें स्कूल में अपने अध्यापक या अध्यापिका सें डाट खानी पड जाए तो वापस आकर पुरा घर अपने सिर पर उठा लेता है। आपको चाहिए कि आप बच्चे को गलत बात के लिए समर्थन देने के बजाय बच्चे के साथ साथ उसके अध्यापक से भी बात करके सही कारण का पता लगाकर अपने  बच्चें को समझाए और भविष्य में दौबारा गलती न दौहरान के लिए सचेत करे। बच्चें के सुनहरे भविष्य के लिए बच्चें और अध्यापक के मध्य एक सेतु का कार्य करे।
एन जी एफ रेडियो की सामाजिक संयोजिका अल्पना मित्तल बताती है हालाँकि की स्कूलों में शारिरीक दण्ड पर बैन है परन्तु कोई भी अध्यापक किसी बच्चे को किसी भी तरह की सजा जानबूझकर नही देता। हमारा मानना है आमतौर पर अध्यापक बच्चों के कान खीचकर उसको सजा देते है। परंतु ऐसा नही है अगर आप अपने कान को ध्यान सें देखें तो आपको आश्चर्य होगा कि आपके कान का आकार किसी गर्भवती माँ की कोख मे पल रहे शिशु की तरह लगता है। एक्युप्रेशर पद्धति की माने तो हमारे कान का हर एक बिन्दु शरीर के किसी न किसी अंग जैसे दिल, दिमाग आदि से जुडा होता है। पढाई करते वक्त जब बच्चा शिथिल हो जाता है या उसका ध्यान भटक जाता है तब अध्यापक उसके कान को दबाकर उसके शिथिल पडे अंगो को सक्रिय करता है न कि उसको किसी तरह की सजा देता है।

कही बच्चे के दोस्त तो जिम्मेदार नही है??---आपके बच्चे का पढाई मन उचटने की एक वजह उसके दोस्त भी हो सकते है। क्या आप इससे सहमत है??
काफी हद तक ये सही भी है बच्चे कई बार अपनी योग्यताओं को ताक पर रखकर अपने दोस्तों की देखा देखी अपने विषयों का चयन करते है जिससे बाद में परीक्षाओं में अच्छे अंक न आने पर उसे अहसास होता है कि उनसे गलती हो गयी। जिससे कई बार बच्चे को अपना एक बेशकीमती साल खराब करना पडता है। कई बार अगर माँ और बाप दोनो कामकाजी है तो वह अपने बच्चो को पुरा समय नही दे पाते है जिसकी वजह से बच्चे धीरे धीरे अपने माँ बाप से दुर होते जाते है और उनका झुकाव दोस्तों की तरफ बढ जाता है जिससे कई बार अपने दोस्तों की बुरी संगत में पड कर बच्चे बुरी आदतों के शिकार जैसे धुम्रपान करना, शराब पीना, स्कुल बंक करना आदि के शिकार हो जाते है। अतः माँ बाप को चाहिए कि अपने व्यस्त जिन्दगी मे से कुछ समय बच्चों के लिए भी निकाले और बच्चों की प्रत्येक गतिविधियों पर नजर जरुर रखे। समय समय पर उनके दोस्तों के बारे में भी जानकारी रखें। कई बार माँ बाप जाने अनजाने अपने बच्चो को उनके दोस्तों के सामने बेइज्जत कर देते है या बच्चों की तुलना उनके दोस्तो से कर बैठते है जिससे बच्चे के अन्दर हीन भावना आ जाती है और उनका ध्यान पढाई से उचट जाता है। माँ बाप को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।

क्या बच्चा खुद जिम्मेदार है???--हाँ ऐसा भी सम्भव है अच्छी पढाई न करने के लिए बच्चे की लापरवाही जिम्मेदार है। क्या आप इससे सहमत है??? आजकल बच्चे को सफल होने के लिए शार्टकट पसन्द है परंतु सफल होने के लिए मेहनत करनी पडती है।
रामायण में लिखा भी है कि "का चुप साधि रहा बलवाना" । सीता की खोज गये हनुमानजी को उनकी ताकत का अहसास कराने के लिए जामवंत जी ने उनको प्रेरित किया था। इसी प्रकार समय समय पर माँ बाप को भी अपने बच्चे को प्रेरित करते रहना चाहिए ।
शिक्षाविद् आर्यवीर लायन विकास मित्तल बताते है कि आजकल बच्चे के परीक्षाएँ समीप आते ही परीक्षा के बुखार से पीडित हो जाते है जिसका इलाज किसी डाक्टर या हकीम के पास नही है केवल और केवल उनके स्वयं के पास है। क्या है वह इलाज??? विकास मित्तल जी बताते है बच्चे परीक्षा का बुखार दुर करने लिए तीन टैबलेट (गोली) लेनी चाहिए परन्तु वह ऐसा नही करता । कौन सी है ये तीन गोलियां ??ये है R L W पहली गोली है R मतलब read या पढाई, दूसरी गोली है L मतलब learn या याद करना और तीसरी गोली है W मतलब write या लिखना। ज्यादातर बच्चे पहली दो गोलियां का सेवन ही करते है वह भी परीक्षा से कुछ दिन पहले। जिसका कोई खास फायदा नही होता। अगर बच्चे को बहुत. अच्छे अंको से उत्तीर्ण होना है तो तीनो गोलियों का सेवन पुरे वर्ष करना चाहिए। दोस्तों बाकि सुझाव अगले लेख मे दूंगा ।

loading...
SHARE THIS

0 comments: