Tuesday, September 13, 2016

क्या हिन्दी बन पायेगी ज्ञान-विज्ञान की भाषा;- विकास मित्तल



पलवल (abtaknews.com )के युग मे निसन्देह हम सभी लोग विज्ञान पर निर्भर है। एक प्रश्न दिमाग में पैदा होता है कि क्या हिन्दी जोकि देश की राजभाषा है (न कि राष्ट्रभाषा) ज्ञान-विज्ञान की भाषा बन पाई है? भारतवर्ष का लगभग समुचा युवा वर्ग जो कि विज्ञान का ज्ञान अर्जित करना चाहता है परन्तु आधुनिकता के इस दौर में उसकी हिन्दी से दूरी निरंतर बढ़ती जा रही है। आखिर ऐसा क्यो????
राजभाषा हिन्दी का उद्गम संस्कृत, पाली, प्राकृत-अपभ्रंश और क्षेत्रीय भाषाओं के समागम से हुआ है। यही वजह है कि हिन्दी न केवल विज्ञान पठन-पाठन की भाषा है वरन्‌ उसमें क्रम से वैज्ञानिकता का विकास परिलक्षित होता हैं। जहा एक और हिन्दी भाषा मे वर्ण और ध्वनियाँ आपस मे बराबर हैऔर हिन्दी जैसे लिखी जाती है वैसे ही पढी जाती है। वही दुसरी तरफ अंग्रेजी भाषा मे २६ वर्णों की ४४ ध्वनियॉ है। विज्ञान के अध्ययन के लिये हिन्दी भाषा ही सबसे उपयुक्त भाषा है क्योंकि इसका अपना शब्द कोष, व्याकरण और लिपि है।
कभी भी सुनने या देखने मे नही आया कि चीन मे चीनी दिवस, रूस में रूसी दिवस, इंग्लैंड में अंग्रेजी दिवस और जापान में जापानी दिवस मनाया गया हो परन्तु हमारे देश मे हिन्दी भाषा के अस्तित्व बनाये रखने के लिए हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवाडा मनाया जाता है । आखिर क्यो??? हद तो तब होती है जिस देश में ७५ फीसदी से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते, लिखते, पढते और समझते हो वहॉ शिक्षा का माध्यम कोई विदेशी भाषा हो – यह असामान्य और अकल्पनीय है।
कभी सोने की चिडिया कहलाने वाले देश को अपनी पहचान बनाने के लिए अपनी मातृभाषा का परित्याग कर एक विदेशी भाषा के सहारा लेना पड रहा है , यह हमारे लिए लज्जा की बात है। कवि भारतेन्दू हरिश्चन्द्र ने अपना जीवन हिन्दी भाषा के लिए समर्पित कर दिया और उन्होने मातृभाषा के लिए लिखा भी है :-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के , मिटत  न हिय को सूल।
निज भाषा मे कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
आज युवा पीढ़ी खासकर वे जो देशी माहोल में भी पश्चिमी  रंग-ढंग से पढ-लिखकर तैयार हुये हैं, उनके जीवन का ध्येय, ऊंचा रहन-सहन, ऊंची या अतिश्रेष्ठ कही जाने वाली गैर सरकारी और अन्तराष्ट्रिय कम्पनीयो में नौकरियॉ पाना है। जिसके लिए वे  विदेश जाकर वहा अध्ययन करके वही रोजगार करने कि इच्छा रखते है । हद तो तब हो जाती है कि विदेशो मे अध्ययन करने के लिए ४ या ५ साल के व्यवसायिक कोर्स को पढने के लिए १ से २ वर्ष ज्यादा लगाने पडते है क्योकि विदेशों मे व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त करने लिए वहा की भाषा सीखना बहुत जरूरी है । अत: कोर्स शुरु करने से पूर्व युवा को वहा की भाषा ज्ञान होना जरूरी है। जिसके लिए उसको १ या २ साल वहा की भाषा सीखनी पडती है तब जाकर वह उस व्यवसायिक कोर्स करने की अनुमति मिलती है जबकि हमारे देश ऐसा कुछ भी नही है क्योंकि देश मे सभी शिक्षा संस्थानो और विश्वविद्यालयो मे शिक्षा का माध्यम एक विदेशी भाषा है। हिन्दी के प्रति इस तरह का उपेक्षापूर्ण रवैया बिल्कुल गलत है।
चीन, जापान ,रुस आदि देशों की तरक्‍की की सबसे बडी वजह उनका अपनी मातृभाषा को सम्मान देना है।वहा पर सभी शिक्षा संस्थानो और विश्वविद्यालयो मे शिक्षा वहा की मातृभाषा दी जाती है।
पलवल डोनर्स क्लब के संयोजक आर्यवीर लायन विकास मित्तल
कहते है कि हिन्दी भाषी युवा चाहे तकनीक क्षेत्र हो या अनुसंधान, प्रबंधन हो या चिकित्सा विज्ञान, सूचना प्रौदयोगिकी हो या कम्प्यूटर ज्ञान – इन सभी क्षेत्रों में पढाई-लिखाई अंग्रेजी माध्यम से करते है। आजादी के ६८ साल बाद भी इंजीनियरिंग और मेड़िकल कॉलेजों में हिन्दी का उपयोग नही होता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों, बैंक और प्रबंधन के संस्थानों में हिन्दी का उपयोग न के बराबर होता है। यदि चीन और जापान में कम्प्यूटर में मातृभाषा के प्रयोग के बखुबी हो रहा है ,वही भारत में ज्ञान की क्रांति के जनक कम्प्यूटर का फैलाव तो हो रहा है लेकिन सिर्फ महानगरों और शहरों में, गॉंव और कस्बों में नही, जहॉ हिन्दुस्तान का दिल धड़कता है। कम्प्यूटर-क्रांति को घर-घर पहुंचाना है तो इसे दिल की भाषा में पढ़ना, पढ़ाना होगा। और भारत और युवा पीढ़ी के लिये वह भाषा हिन्दी ही हो सकती है कोई और नही। विज्ञान को भी समझना, समझाना मातृभाषा में जितना सहज है, उतना शायद अंग्रेजी जैसी परभाषा में नही। स्वयं वैज्ञानिकों  अलबर्ट आइन्सटाईन भी विज्ञान विषयक चर्चा में जब अधिक रम जाते थे तो अंग्रेजी छोड़कर अपनी मातृभाषा जर्मन में बोलने लगते थे।
वही एन जी एफ रेडियों की सामाजिक संयोजिका अल्पना मित्तल कहती है कि आज अगर बच्चो से बात की जाए तो उनको हिन्दी बोलने और समझने मे दिक्कतें आती है बच्चों को नवासी और उन्नासी का अन्तर नही पता। यहा तक कि हिन्दी मे पहाडे और गिनती तक बोलने मे दिक्कतें आती है।
लेकिन खुशी इस बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी  हिन्दी भाषा का उपयोग देश हो या विदेश अपने भाषणों मे बखूबी करते है। जिसका असर देश के युवा वर्ग पर अवश्य पडेगा।
देश की  उन्नति के लिये  शिक्षा की बुनियादी नीतियों में बदलाव लाकर हिन्दी में ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई को प्रोत्साहन देना होगा। यदि युवा वर्ग को हिन्दी भाषा के प्रति आकर्षित करना है तो हिन्दी मे दूसरी भाषाओं के हिन्दी बोली में प्रचलित शब्दों को उसी रूप में समाहित करना होगा, अनुवाद प्रक्रिया का प्रमाणीकरण कर उसे सरल और सार्थक बनाना होगा। शिक्षा में आधुनिक तकनीकी के समस्त पहलु चाहे वे ऑडियो हो या विजुअल एनीमेटेड़ उसमें हिन्दी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग की संभावनाऍ तलाशनी होगी। इस दौर में कम्प्यूटर ही नही हाथ में समा जाने वाले पाम टॉप, मोबाईल तथा अनेकानेक ई-उपकरणों में ऐसे हिन्दी के साफटवेअरों के प्रचलन एवं सर्च इंजिनों के निर्माण की आवश्यकता है। जो विज्ञान एवं तकनीकी विषयों को आसान बनाते हैं ।हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाकर पूरे विश्व में फैलाना निश्चय ही हर भारतीय के लिये गौरव की बात है। लेकिन उसे सबसे पहले अपनी जड़ों में ही मजबूत करना होगा।  आज हिन्दी को भी ऐसे विद्वानों, वैज्ञानिकों, अनुवादकों की आवश्यकता है जो हिन्दी को सरलीकृत कर उसे आम आदमी की जुबान पर बना दे। और उसे हिन्दोस्तान के हर कोने में पहुंचा दे।

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