Sunday, August 28, 2016

ऑनलाइन हमेशा अच्छा नहीं होता, ये डिजिटल खाई बना रहा है


Qjhnkckn 28 अगस्त 2016(abtaknews.com )इंटरनेट के जरिये परीक्षा लेने की नवीनतम तकनीकों ने पूरी दुनिया में शिक्षा के तौर-तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। इस पद्धति ने पूरी दुनिया के शिक्षकों और छात्रों को बेहद आसानी से एक दूसरे के साथ जुड़ने की सहूलियत दी है। और इससे समय भी बचता है। 
ऐसे में छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए ऑनलाइन टेस्टिंग बेहद लोकप्रिय हो गई है। लेकिन पारंपरिक तरीकों की तुलना में इसके अपने फायदे और नुकसान हैं। आइये थोड़ा और गहराई से समझें कि किस तरह शिक्षण का यह तरीका छात्रों की बेहद अहम जरूरतों का नाश कर कर रहा है। आईएएस, पीसीएस, आईआईटी, एआईईईई, एसएससी, बैंक परीक्षाओं की तैयारी करने वाले ज्यादातर छात्र बिना इंटरनेट के पढ़ाई करते हैं। बेहद कम छात्र ऐसे हैं जो कुशलता से कंप्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं। यही नहीं ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र परीक्षा प्रक्रिया की डिजिटाइजेशन प्रक्रिया से वाकिफ नहीं हैं। यही नहीं वे बहुत जानकारी के बावजूद नाकाम हो जाते हैं या परीक्षा ही नहीं दे पाते। ऑनलाइन परीक्षा केंद्रों में भी टीम व्यूअर के जरिये नकल और पेपर लीक के कई मामले सामने आए हैं। चूँकि ज्यादातर परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं ऐसे में ये पता लगाना मुश्किल हो गया है कि परीक्षा कितने सही तरीके से हुई है। 
हालाँकि ऑनलाइन टेस्टिंग से अपंग लोगों को फायदा होता है। कंप्यूटर को विभिन्न शारीरिक अपंगताओं के हिसाब से ढाला जा सकता है ताकि उन्हें सामान्य लोगों के मुकाबले बराबरी का मौका मिले। हालाँकि ये कुछ तबकों के लोगों के लिए वरदान है। लेकिन ऐसे ज्यादातर लोगों के लिए ये मुश्किल पैदा करने वाला है, जो कंप्यूटरों का कुशलता से इस्तेमाल नहीं कर सकते। ऑनलाइन टेस्टिंग में निरंतर कनेक्टिविटी ना रहना सबसे बड़ी दिक्कत है। ग्रामीण इलाकों में परीक्षा के दौरान कनेक्टिविटी टूट सकती है, क्योंकि वहां बिजली के वैकल्पिक इंतजाम और अच्छी रफ्तार वाला इंटरनेट नहीं होता। ऐसे में कई बार लोग परीक्षा नहीं दे पाते या परीक्षा अधूरी रह जाती है। 

इंटरनेशनल बिजनेस फर्म के प्रोपराइटर श्री अजय जैन ने बताया कि समस्या यहीं खत्म नहीं होती। किसी भी ऑनलाइन परीक्षा की सबसे बड़ी दिक्कत उसकी सच्चाई को लेकर है। ऑनलाइन टेस्ट के दौरान नकल रोक पाना मुश्किल है। जब तक एक निर्देशक वहां मौजूद रहकर जांच ना करे नकल रोक पाना तकरीबन असंभव है।
वहीं परीक्षा हॉल में लोगों को दिमाग लगाना पड़ता है। उन्हें प्रस्तुतियां और भाषण देने पड़ते हैं। उन्हें अलग-अलग नजरिये वाले लोगों के साथ समूहों में काम करना पड़ता है। पारंपरिक पद्धति में ये सभी पहलू सुनिश्चित किए जाते हैं।  
परीक्षा की पारंपरिक पद्धति में छात्रों को क्लास में पढ़ाए गए पाठ को याद रखना पड़ता है। वहां दिमाग काम करता है। लगातार ऐसा करने से स्मरण शक्ति बढ़ती है और वे बेहद तेजी और कुशलता से सीखते हैं। अगर किसी को पढ़ना या याद करना ना हो तो पढ़ाया गया पाठ उनके लंबे समय के स्मरण में शामिल नहीं हो पाता। 
 अजय जैन

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