Tuesday, August 2, 2016

हरियाणा में सत्ता परिवर्तन हुआ है व्यवस्था परिवर्तन नहीं




हिसार-अगस्त 02,2016(abtaknews.com ) जिस विश्वविध्यालय को देश का नंबर एक तकनीकी व हरियाणा का नंबर एक विश्वविध्यालय होने का तगमा मिला हैउसके अधिकारी अपने अधिकारीयों के अपराधों पर पर्दा डाले रखने में भी नंबर एक ही है ! आइये जाने कैसे?जब एक उम्मीदवार ने इस विश्वविध्यालय द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में इस विश्वविध्यालय की सहायक प्रवक्ता की भर्ती में हुई धान्द्ली को चुनोती दी तो इस विश्वविध्यालय के उपकुलपति व रजिस्ट्रार ने बेखोफ होकर माननीय उच्च न्यायालय में ही झूठे तथ्य पेश कर दिए व जवाब दिया की सम्बंधित उम्मीदवार को चयन के लिए बनाये नियमो व यू जी सीनियमों के तहत उसकी एक डिग्री के नंबर ना दिए गए थे ! ठीक ऐसा ही जवाब गैर क़ानूनी ढंग से लगी श्रीमती संगीता ने उच्च न्यायालय में अपने जवाब में दिया व उसने विश्वविध्यालय के दिए झूठे जवाब से आगे बढकर ये भी झूठा दावा किया कि ना तो सम्बंधित उम्मीदवार की डिग्री मान्यता प्राप्त थी व ना ही उसने अपनी डिग्री के नंबर मांगे थे, जबकि हकीकत ये थी कि सम्बंधित अत्यंत काबिल उम्मीदवार का चयन रोकने के लिए व श्रीमती संगीता व अन्य का चयन करने के लिए इस विश्वविध्यालय के अपराधी करमचारियों ने आपस में मिलकर इस भर्ती घपले को अंजाम दिया था ! व जब सम्बंधित तथ्यों के बारे में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गयी तो इस विश्वविध्यालय के जन सूचना अधकारी श्री संजय सिंह व डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी), ने अपने जवाब में लिखित में पूछे जाने के बावजूद अपने जवाब में अपना नाम तक छिपाए रखा ! इन्होने जो जवाब दिया उसे जानकर श्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार की पारदर्शिता के खोखले दावों की हवा निकल जाएगी !
अपने जवाब में इस विश्वविध्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) ने बताया की हमारे पास इस बात का कोई रिकॉर्ड मौजूद ना है, जिससे श्रीमती संगीता द्वारा उच्च न्यायालय में इस विश्वविध्यालय द्वारा सम्बंधित उम्मीदवार को नंबर ना देने के बताये गए कारणों की पुष्टि होती हो ! हैं ना कमाल की बात कि विश्वविध्यालय की एक कर्मचारी, विश्वविध्यालय द्वारा नंबर ना देने के जो कारण उच्च न्यायालय में बता रही है, उसका रिकॉर्ड विश्वविध्यालय के पास ना होना बताया जा रहा है, जबकि नियमानुसार जन सूचना अधकारी श्री संजय सिंह को उक्त कर्मचारी से सुचना के अधिकार की धारा 5 के तहत सम्बंधित रिकॉर्ड लेकर देना चाहिए था ! व यदि इस बात का कोई रिकॉर्ड ही ना था तो उक्त कर्मचारी के विरुद्ध विश्वविध्यालय के सन्दर्भ में उच्च न्यायालय के समक्ष झूठे तथ्य रखने का मामला उच्चाधिकारियों को पेश किया जाना चाहिए था ! पर जन सूचना अधकारी श्री संजय सिंह ऐसा करते कैसे ?, जब विश्वविध्यालय के उपकुलपति, रजिस्ट्रार व अन्य कर्मचारी खुद ही इस घपले में शामिल थे !
इसी कड़ी में इस विश्वविध्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) ये बताने में भी असमर्थ रहे कि वो कौन से चयन के लिए बनाये नियम व यू जी सी के नियम थे जिनका हवाला इस विश्वविध्यालय के उपकुलपति व रजिस्ट्रार ने उच्च न्यायालय में दिया था व अपने जवाब में अपने विश्वविध्यालय के चयन समिति के आंतरिक सदस्यों के जवाब को एक रिपोर्ट बताकर संलगन किया, जोकि ना तो चयन के लिए बनाये नियम पर आधारित था व ना ही किसी यू जी सी के नियमो पर ! ऐसा लगता है कि इस इस विश्वविध्यालय का एक ही नियम है और वो हे कि ‘मैं चाहे ये करू, मैं चाहे वो करू, मेरी मर्जी, क्योंकि मुझे कोई बूझने वाला नहीं’
काबिले गौर बात यह है कि अपने एक पूर्व में दिए जवाब में इसी डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) को मानना पड़ा था कि ऐसे कोई नियम नहीं है, जिसके तहत सम्बंधित उम्मीदवार की डिग्री के नंबरों को नजरंदाज किया जा सकता था !
अब सबसे चोकाने वाली बात यह है कि इस डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) ने कुछ ऐसा भी बताया जिसका ना तो कोई रिकॉर्ड है व ना ही जिसे पूछा गया था ! इसने खुद से ही ये बताया की इस विश्वविध्यालय ने नंबर बनाये गए नियमों के अनुसार दिए थे ! है ना कमाल की बात ! नियम है ही नहीं और बता रहा है कि नियमानुसार नंबर दिए थे ! इस बात का सुप्रीम कोर्ट केस में ही फैसला हो रखा है कि सूचना के अधिकार में जवाब देने वाले के पास ये अधिकार ही ना है कि वो खुद से कोई बात बनाकर बता सके, पर यहाँ तो इसने बगेर पूछे ही, खुद से बात बनाकर बता दी ! आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) खुद को खुदा समझकर जवाब देने लग गया और दूसरी तरफ पूछने पर भी अपने जवाब में अपना नाम तक ना बता पाया ! दरअसल कहावत है कि चोर चोर मौसेरे भाई ! सभी एक दुसरे को बचाने में जुटे हैं ! ऐसा नहीं है कि सम्बंधित कानून का जन सुचना अधिकारी श्री संजय सिंह या डिप्टी रजिस्ट्रार (फैकल्टी) को पता नहीं है ! उपरोक्त सुप्रीम कोर्ट केस का भी उन्हें पता है व एक केस में इसी जन सुचना अधिकारी ने राज्य जनसूचना आयोग में इसकी बात पर एक केस में जवाब ना देना उचित ठहरवाया था कि सूचना की अधिकार के अंतर्गत किसी सुचना अधिकारी से उसकी राय नहीं मांगी जा सकती! ठीक है ना, कि जहाँ जरुरत पड़ी पढ़े लिखे बन गए व जहाँ जरुरत पड़ी अज्ञानी बन गए !
जी हाँ ! यह सच है की हरियाणा में सरकारी नोकरियों में अपने उम्मीदवार को लगाने हेतु चयन प्रावधानों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाने का पुराना चलन रहा है व फिर अपनी गलतियों को छुपाने के लिए एक के बाद एक गैर क़ानूनी पैतरा अपनाने का !हरियाणा में नई सरकार आने व विश्वविध्यालय में नये उपकुलपति व रजिस्ट्रार के आने के बावजूद व्यस्था पुरानी ही जारी हैं ! शायद बोतल बदली है, अंदर वही है !

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