Thursday, July 21, 2016

डीबीटी से फर्जी कनेक्शनों की समाप्ति से दो वर्षों में 21,000 करोड़ की बचत



इस संबंध में यह स्पष्ट किया जाता है कि डुप्लीकेट/नकली/फर्जी/निष्क्रिय घरेलू एलपीजी कनेक्शनों की पहचान करने के लिए एक गहन अभियान चलाया गया था और 1 अप्रैल, 2015 तक इस तरह के 3.34 करोड़ कनेक्शनों की पहचान तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) द्वारा की गई थी। डीबीटीएल (पहल) व्यवस्था के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप इन 3.34 करोड़ एलपीजी कनेक्शनों को ब्लॉक करना संभव हो पाया, क्योंकि सब्सिडी का हस्तांतरण केवल उन्हीं उपभोक्ताओं के खातों में किया गया, जिन्होंने पहल के तहत अपना पंजीकरण कराया है और जिन्हें डुप्लीकेशन खत्म करने संबंधी अभियान में बिल्कुल सही पाया गया है। डीबीटीएल से पहले सभी या इन 3.34 करोड़ उपभोक्ताओं में से ज्यादातर ग्राहक वितरकों से सब्सिडी प्राप्त सिलेंडरों को खरीदना अवश्य ही जारी रखते। हालांकि, इन खातों को अगर ब्लॉक नहीं किया जाता तो कच्चे तेल की कीमतों में कमी होने के बावजूद सब्सिडी बिल भारी-भरकम होता।
उपर्युक्त प्रयासों से अनुमानित बचत की गणना कुछ इस तरह से की गई है-वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान पहल के दायरे से बाहर 3.34 करोड़ उपभोक्ताओं के लिए अनुमानित बचत 3.34 करोड़  x 12 सिलेंडर  x 369.72 रुपये (वित्त वर्ष 2014-15 के दौरान प्रति सिलेंडर औसत सब्सिडी) बैठेगी, जो 14818.4 करोड़ रुपये के बराबर होगी। इसी सिद्धांत का अनुसरण करने पर वित्त वर्ष 2015-16 में अनुमानित बचत 6,443 करोड़ रुपये की होगी और इन दोनों वर्षों में कुल बचत 21,261 करोड़ रुपये आंकी जाएगी।

वित्त वर्ष
प्रति सिलेंडर औसत सब्सिडी (उस वर्ष के लिए)
 गणना
अनुमानित बचत (करोड़ रुपये में)
2014-15
 369.72 रुपये
3.34 * 369.72 * 12
14,818.4
2015-16
150.82 रुपये
3.56 * 150.82 * 12
6,443
                       कुल
21,261.4

 किसी भी वर्ष में रसोई गैस की कुल खपत वर्ष के आरंभ में कनेक्शनों की संख्या, पहल के तहत डीबीटी की प्रक्रिया के जरिए वर्ष के दौरान समाप्त किए गए फर्जी कनेक्शनों, वर्ष के दौरान वास्तविक उपभोक्ताओं को जारी किए गए नए कनेक्शनों और व्यक्तिगत खपत में सामान्य उतार-चढ़ाव का संयोजन होता है। अतः, डीबीटी के क्रियान्वयन से बचत की गणना केवल वर्ष के दौरान कुल खपत अथवा सब्सिडी पर कुल खर्च के आधार पर ही बिल्कुल सही ढंग से नहीं की जा सकती। अगर डीबीटी का क्रियान्वयन नहीं किया गया होता तो सब्सिडी मद में खर्च होने वाली राशि वर्ष 2014-15 में 14,818 करोड़ रुपये और वर्ष 2015-16 में 6,443 करोड़ रुपये ज्यादा होती। इसलिए डीबीटी के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप नकली/डुप्लीकेट/फर्जी कनेक्शनों की समाप्ति से कुल बचत पिछले दो वर्षों के दौरान 21,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है, जिसकी गणना ऊपर की गई है। इस आंकड़े की तुलना सब्सिडी पर किए गए वास्तविक खर्च से नहीं की जा सकती, क्योंकि इन दो वर्षों के दौरान नए वास्तवकि कनेक्शनों पर दी गई सब्सिडी भी इसमें शामिल है। पहल पर अमल अगर नहीं किया गया होता तो पेट्रोलियम की कीमतें कम रहने के बावजूद सब्सिडी बोझ इन वर्षों के दौरान वास्तविक खर्च से कहीं ज्यादा होता।
इसके अलावा, इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि फर्जी कनेक्शनों को सफलतापूर्वक समाप्त किए जाने के ठोस साक्ष्य की झलक गैर-सब्सिडी प्राप्त वाणिज्यिक एलपीजी की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि में देखने को मिलती है, जिसमें अप्रैल 2015 से लेकर मार्च 2016 तक की अवधि के दौरान 39.3 प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह पहल से पहले के अनुभव के ठीक विपरीत है क्योंकि उस दौरान इसकी वाणिज्यिक बिक्री की वृद्धि दर या तो नगण्य थी या उसमें गिरावट दर्ज की जा रही थी।

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